Saturday, February 17, 2007

जो समर में हो गये अमर


जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रृद्धागीत, धन्यवाद में

जो समर में हो गए अमर...

लौट कर ना आएंगे विजय दिलाने वाले वीर
मेरे गीत अंजली में उनके लिये नयन-नीर
संग फूल-पान के
रंग हैं निशान के
शूर-वीर आन के

विजय के फूल खिल रहें हैं, फूल अध-खिले झरे
उनके खून से हमारे खेत-बाग-बन हरे
घ्रुव हैं क्राँति-गान के
सूर्व नव-विहान के
शूर्य-वीर आन के

वो गए कि रह सके, स्वतंत्रता स्वदेश की
विश्व भर में मान्यता हो मुक्ति के संदेश की
प्राण देश-प्राण के
मूर्ति स्वाभिमान के
शूर-वीर आन के

जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रृद्धागीत, धन्यवाद में


Jo Samar Mein Ho G...


लता मंगेश्कर की आवाज़ में यह मधुर गीत डाऊनलोड करें।

Thursday, February 15, 2007

सैंतीस रूपये का चूना

किसी से खबर मिली थी कि भारत सरकार का संगणक विभाग भारतीय भाषाओं के विस्तार के लिये हिन्दी (व अन्य भाषाओं) में सोफ्टवेयर की सी.डी. भेज रहा है। शौक मैं भी उनके जालस्थल पर पहुँच गया और जबकि मैं उन सोफ्टवेयरों को डाऊनलोड भी कर सकता था फिर भी एक सी.डी. का अनुरोध कर दिया। पता अमरीका वाला डाला और...फिर बात भूल गया। किसने सोचा था कि सरकारी दफ्तर से कुछ मँगाओ तो मिल भी जायेगा वो भी सात समुंदर पार। महीनों के बाद एक दिन सी.डी. यहाँ पहुँच ही गई। वाह जी, बड़ा आश्‍चर्य हुआ। फिर जब डाक टिकट की कीमत देखी तो पहला विचार यही आया कि सरकारी सैंतीस रूपये बिगड़वा दिये मैने!

किसने सोचा था कि सरकारी दफ्तर से कुछ मँगाओ तो मिल भी जायेगा वो भी सात समुंदर पार।

खैर कभी उस सी.डी. के सोफ्टवेयरों का ऊपयोग करूँगा तो, शायद जब अपने घर पर कंप्यूटर लाऊँ माता-पिता के लिये। मेरे लिये तो बरहा ही पर्याप्त है अभी। फिर भी जिन लोगों को मँगाना हो वो कोशिश कर सकते हैं - अगर यहाँ भेज सकते हैं तो निश्चित ही कहीं भी भेज सकते होगें। सी.डी. में हिन्दीभाषी फॉन्ट और कुंजीपटल ड्राईवर्स, ऑफिस (भारतीय), ब्राऊज़र (फायरफॉक्स), आई. एम. (गेम) व ई-मेल सोफ्टवेयर (कोलंबा), शब्दकोष, स्पैल-चैकर, टाईपिंग सिखाने का व लेख से आवाज़ बदलने वाला सोफ्टवेयर इत्यादि हैं।

Wednesday, February 14, 2007

ब्लॉगर प्रथम से ब्लॉगर द्वितीय

अभी-अभी चिठ्ठे को नये ब्लॉगर पर स्थानांतरित किया है इसलिये अगर आपके आर. एस. एस. फीड रीडर में मेरी प्रविष्टियों का सैलाब आ गया हो तो करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ।

स्थानांतरण के पश्‍चात जब मैनें अपनी प्रविष्टियों के लेबल के साथ पुनः प्रकाशित किया तो सभी की मौलिक प्रकाशन तिथी गायब हो गयी और नई (आज की) प्रकाशन तिथी के साथ प्रकाशित हुई। हाथ से तारीख बदलनें पर भी कोई प्रभाव ना पढ़ा और अब मेरी सारी की सारी प्रविष्टियाँ १२ फरवरी की दिनांक के साथ छपी हुई हैं। किसी और के साथ ऐसा हुआ क्या? कोई उपाय है क्या मौलिक प्रकाशन तिथियाँ वापस लाने का?

Tuesday, February 13, 2007

ज्ञानेंद्रियाँ - बीमारियाँ कैसी-कैसी (भाग १)

कभी-कभी लगता है कि हम, मानवता के रूप में, कितना कुछ जानते है अपने संसार के बारे में, और कभी...कभी ऐसा लगता है कि अभी तो ज्ञान के भंडार की सतह ही खरोंची है। अगर मैं अपने दिमाग को कितना भी घुमा लूँ, कितना भी क्रूर बन जाऊँ और इंसानों के लिये दिमाग की बीमारियाँ बनाने की कोशिश करूँ तो भी वास्तविकता से मीलों परे रहूँगा। अभी ही ऑलिवर सेक्स (Oliver Sacks) की किताब "आदमी जो अपनी पत्‍नी को टोप समझ बैठा" (The Man Who Mistook His Wife for a Hat) पढ़कर खत्‍म की, और ऐसी दुनिया के दरवाजे खुल गये जो अभी तक मुझे पता भी नही था कि होती है। आने वाली कुछ प्रविष्टियों में मैं आपका परिचय उन मानसिक और दिमागी बीमारियों से कराने का प्रयास करूँगा जो डर और रोमांच, आश्चर्य और करूणा की भावनाऐं एक साथ पैदा करती है।

अपनी शृंखला शुरू करने से पहले कुछ मूलभूत विचारों से अवगत होना जरूरी है। हम जानते हैं कि दिमाग (brain) में हर क्रिया के लिये एक केन्द्र होता है जिसे वैज्ञानिक मैगनेटिक रीज़ोनेन्स इमेजिंग (magnetic resonance imaging) से पता लगा रहें है। दिमाग के दोनो अर्ध अलग-अलग जगह से देखना, सुनना, महसूस करना, स्वाद, ताप, दबाव, दर्द, याद्दाश्त - छोटे व लंबे समय के लिये, अक्कल, समझदारी, बुद्धिमानी, संतुलन इत्यादि कामों को क्रियांवित करते हैं। दिमाग के किसी भी भाग में चोट या खराबी उस भाग से संबंधित कार्य को अपने सामान्य बर्ताव से बदल सकती है।

ऐसी दुनिया के दरवाजे खुल गये जो अभी तक मुझे पता भी नही था कि होती है।दूसरी महत्वपूर्ण जानने लायक बात ज्ञानेंद्रियों से संबंधित है। हम अपने बाहर के परिपेक्ष्य को दृष्टि, गंध, स्पर्श, श्रवण व स्वाद के माध्यम से महसूस करते हैं। लेकिन इन पाँच ज्ञानेंद्रियों के अलावा भी दो ज्ञानेंद्रियाँ हमारे शरीर के लिये जरूरी हैं जो बाहरी वातावरण का नही बल्कि शरीर के अंदरूनी वातावरण का ज्ञान दिमाग तक पहुँचाती हैं। पर यह ज्ञानेंद्रियाँ इतनी महत्वपूर्ण और जिंदगी का अभिन्न हिस्सा हैं कि अधिकतर हमें उनकी उपस्तिथी का ऐहसास उनसे वंचित होने के बाद ही हो पाता है।

एक तो है हमारे शरीर का संतुलन। हम इस पर ध्यान नही देते क्योंकि ये हमारे जीवन का हमेशा का हिस्सा है पर हमारे शरीर में संतुलन के एक ’लेवल’ (level) जैसा यंत्र होता है जिसकी वजह से हम अंधेरे में भी बिना गिरे सीधे चल सकते हैं। हमारे मध्य-कर्ण में यह ’लेवल’ कुछ बढ़ई या कारीगर के पास होने वाले यंत्र की तरह ही एक पतली नलीं में भरा द्रव होता है। दूसरी महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्री है हमारे दिमाग में हमारे शरीर की छवि। आप आँख बंद करे भी अपने हाथ से अपना कान छू सकते हैं ना? कभी सोचा है कि आपके हाथ को कैसे पता चला की आपका कान कहाँ हैं? यह इसी ज्ञानेंद्री की वजह से होता है जिसकी वजह से प्रतिक्षण हमारे दिमाग में हमारे शरीर के हर अंग की स्तिथी एक प्रतिबिंब की तरह दिमाग में छपी रहती है। अत्याधिक अल्कोहोल से इन ज्ञानेंद्रियों की क्षमता कमजोर हो जाती है और इसीलिये कुछ देशों में पुलिस नशे में गाड़ी चलाने वालों से एक सीधी रेखा में चलने का या फिर आँख बंद कर अपनी नाक छूने का परीक्षण करवाती है।

>> भाग २ >>

Monday, February 12, 2007

कुछ सवाल बिना जवाब

माने कि आप एक डॉक्टर हैं जो किसी गाँव में जानलेवा बीमारी से लड़ रहें हैं। कुल तीनसौ लोगो को ये बीमारी है और आपके पास उपचार के दो रास्ते हैं। अगर रास्ता 'अ' चुनते हैं तो कुल सौ लोगों की जान बचा सकेगें और रास्ता 'ब' चुनते हैं तो एक-तिहाई संभावना है कि सारे लोग बच जाऐं और दो-तिहाई संभावना है कि एक भी नही बचेगा। आपके पास और कोई रास्ता नही है। 'अ' और 'ब' में से कौनसा उपचार चुनेंगें आप? अपना जवाब ध्यान में रखें।

माना कि आप एक सिनेमा देखने जा रहें है सिनेमाघर में जहाँ टिकट की दर सौ रूपये है। जैसे ही आप सिनेमा परिसर में घुसते हैं आप पाते हैं कि आपके सौ रूपये गुम हो गये जेब से। क्या आप फिर भी सिनेमा का टिकट खरीदेंगें? यह मानिये कि आपकी जेब में दौसौ से ज्यादा रूपये थे। सौ की राशि को अपनी आय के अनुसार घटा-बढ़ा लें इस तरह से कि उस राशि के खोने का आपको थोड़ा दुःख होवे। अपना जवाब ध्यान में रखें।

माने कि आप एक डॉक्टर हैं जो किसी गाँव में जानलेवा बीमारी से लड़ रहें हैं। कुल तीनसौ लोगो को ये बीमारी है और आपके पास उपचार के दो रास्ते हैं। अगर रास्ता 'अ' चुनते हैं तो कुल दौसौ लोगों की मौत होगी और रास्ता 'ब' चुनते हैं तो एक-तिहाई संभावना है कि किसी की मौत नही होगी और दो-तिहाई संभावना है कि सारे लोग मर जाऐं। आपके पास और कोई रास्ता नही है। 'अ' और 'ब' में से कौनसा उपचार चुनेंगें आप? अपना जवाब ध्यान में रखें।

माना कि आप एक सिनेमा देखने जा रहें है सिनेमाघर में जहाँ टिकट की दर सौ रूपये है। आप टिकट खरीदकर जैसे ही अंदर घुसे पता चला टिकट हाथ से गुम हो गया। टिकट दुबारा लेने या पैसे वापस लेने की कोई व्यवस्था नही है। क्या आप फिर भी दूसरा टिकट खरीदेंगें? अपना जवाब ध्यान में रखें।

क्या आपके पहले और तीसरे सवालों के जवाब अलग-अलग हैं? क्या आपके दूसरे और चौथे सवालों के जवाब अलग-अलग हैं? अगर हाँ तो क्यों? अगर नही तो क्यों नहीं? थोड़ा मनन कीजीये या फिर विश्लेषण के लिये Barry Schwartz की पुस्तक The Paradox of Choice: Why More Is Less देखिये। समय मिला तो मैं भी पुस्तक समीक्षा के रूप में कुछ लिखूँगा।

Sunday, February 11, 2007

एक रासायनिक विश्लेषण (हास्य)

अगर इस चिठ्‍ठे को थोड़ी देर निर्लज्जता की इज़ाजत हो तो ये चुटकुला प्रस्तुत करता हूँ। नाराज़ मत होईयेगा।

औरत

तत्व: औरत
खोजकर्ता: एडम
अणुभार: ४० से २०० किलो तक, औसतन ५३.६ किलोग्राम
उपलब्धि: सभी मानवीय आवासों में बहुतायत से उपलब्ध

भौतिक लक्षण:
सतह अधिकतर पतली रंगीन झिल्ली से ढकी
बिना कारण उबाल और जमाव
विशेष व्यवहार करने पर पिघलन
गलत उपयोग पर कड़वी

रासायनिक लक्षण:
सोना, चाँदी और अन्य मूल्यवान धातुओं से अति आकर्षण
भारी मात्रा में मँहगे सामान की खपत
बिना पूर्व कारण और चेतावनी के विस्फोटक
सबसे शक्तिशाली पैसा-कम करने का तत्व आदमी के लिये

सामान्य उपयोग:
बहुत सुंदर और दिखावटी, विशेषकर स्पोर्ट्स कारों में
आराम में सहायक
बहुत उपयोगी सफाईकारी तत्व

जाँच:
शुद्ध तत्व अपनी प्राकृतिक अवस्था में पाये जाने पर गुलाबी हो जाता है
अपने से बेहतर नमूने के पास रखा जाने पर हरा हो जाता है।

चेतावनी:
इस तत्व के कई नमूने एक साथ अलग-अलग जगह पर रखे जा सकते हैं जहाँ तक की वे एक-दूसरे के सीधे संपर्क में ना आयें। इस तत्व से लंबे समय तक संपर्क तीव्र मानसिक, आर्थिक और शारीरिक तनाव का कारण बन सकता है।

आदमी

और भाई लोगों आप हँसना शुरू करें उससे पहले अपने गिरहेबान में भी देख लें! चित्र थोड़ा जटिल है इसलिये हिन्दी में नही अनुवादित किया।

Saturday, February 10, 2007

गर्मा-गरम शेरो-ओ-शायरी

ये भी किसी ई-मेल द्वारा अग्रेषित चिठ्ठी का उत्पाद है:

कर दिया इज़हारे-इश्क हमने मोबाईल पर,
लाख रूपये की बात थी, दो रूपये में हो गई
*****
और भी चीज़ें बहुत सी लुट चुकीं हैं दिल के साथ,
ये बताया दोस्तों ने इश्क फ़रमाने के बाद,
इसलिये कमरे की एक-एक चीज़ 'चैक' करता हूँ,
एक तेरे आने से पहले एक तेरे आने के बाद
*****
खिड़की खुली जुल्फ़ें बिखरी, दिल ने कहा दिलदार निकला,
पर हाय रे मेरी फूटी किस्मत, नहाया हुआ सरदार निकला
*****
कहते हैं कि इश्क में नींद उड़ जाती है,
कोई हमसे भी इश्क करे,
कमबख्त नींद बहुत आती है
*****
प्यार के ज़ाम को ऐसे ना पियो कि,
आधा पिया और आधा छोड़ दिया,
यारों ये प्यार है प्यार, नही कोई विम बार,
जो थोड़ा सा लगाया और बस हो गया
*****
इधर खुदा है, उधर खुदा है,
जिधर देखो उधर खुदा है,
इधर-उधर बस खुदा ही खुदा है,
जिधर नही खुदा है, उधर कल खुदेगा
*****
तुमसा कोई दूसरा ज़मीं पर हुआ,
तो रब से शिकायत होगी,
एक तो झेला नही जाता,
दूसरा आ गया तो क्या हालत होगी
*****
दुरख्त के पैमानें पर चिल्मन-ए-हुस्न का फ़ुरकत से शरमाना,
दुरख्त के पैमानें पर चिल्मन-ए-हुस्न का फ़ुरकत से शरमाना,
ये 'लाईन' समझ में आये तो मुझे ज़रूर बताना
*****
तेरे घर पे सनम हज़ार बार आयेंगे,
तेरे घर पे सनम हज़ार बार आयेंगे,
घंटी बजायेंगे और भाग जायेंगे,
*****
क्यों अपनी कब्र खुद ही खोद रहा है ग़ालिब,
क्यों अपनी कब्र खुद ही खोद रहा है ग़ालिब,
ला, फवड़ा मुझे दे

Wednesday, February 7, 2007

नये चिठ्ठो से परिचय

वैसे तो ये चिठ्ठा-दिवस (३१ अगस्त) की परंपरा है पर हमें इतना सब्र कहाँ अब? इसी लिये मेरे पसंद के अतिप्रिय चिठ्ठों से आप पाठकजनों का परिचय कराना चाहता हूँ। पहले ही बता दूँ कि वे सारे अंग्रेजी में हैं। वैसे जब भी एक मनोरंज़क चिठ्ठा मिलता दिल बार-बार अंतर्जाल और चिठ्ठों के अविष्कारकों को दुआ देने लगता है!

किसी की बात को छुप के सुने तो कई पुख़राज़ मिल जाते है। रोज़ाना आपके लिये दुनिया भर से कही-सुनी बातों को प्रस्तुत करते हैं ये चिठ्ठे: Overheard in New York, Overheard in the Office, Overheard at the Beach| वैसे तो चुटकुलों के अनगिनत पन्ने हैं जाल पर पर सामान्य इंसानों की सामान्य बातें इन चुटकुलों की मौलिकता और हास्य को अद्वितियता प्रदान करती है।

और अगर आप को अपनी दुनिया के बारे में थोड़ा भी रोचकता और जिज्ञासा तो आप इस पन्ने को छोड़ ही नही सकते: Damn Interesting। और मेरी बात मानिये ये पृष्ठ अपने शीर्षक पर शत्‌-प्रतिशत खरा है।

और अंत में, हालाँकि ये चिठ्ठा तो नही पर बड़े काम का जालपृष्ठ है जहाँ आप ऑनलाईन ही अपनी किताब की अलमारी सजा सकते है। मेरे द्वारा पठित पुस्तके यहाँ देखे और अपना पुस्तकालय भी बाँटे।

ये पत्‍नियाँ


  • मैं और मेरी पत्‍नी बीस साल तक खुश थे। फिर हमारी शादी हो गई।

  • सुखी शादी का रहस्य? एक रहस्य ही रहेगा।

  • मैं अपनी पत्‍नी से एक साल से नही बोला हूँ। मै उसकी बात को बीच में नही काटना चाहता था।

  • शादी के पहले आदमी अधूरा है। शादी के बाद पूरा का पूरा निपट जाता है।

  • मुझे शादी के बाद तक ये पता नही था कि सच्ची खुशी क्या होती है। तब तक काफी देर हो चुकी थी।

  • शादी बुद्धी के ऊपर कल्पना की जीत है। दूसरी शादी अनुभव के ऊपर आशा की।

  • यह नही है कि शादीशुदा आदमी कुँवारों से ज्यादा जीते हैं। उनको बस ऐसा प्रतीत होता है।

  • पत्‍नी को खोना मुश्किल हो सकता है। मेरे मामले में ये असंभव था।

  • निस्संकोच कीजीये शादी। अगर पत्‍नी अच्छी मिली तो खुश रहेंगे और खराब मिली तो दार्शनिक बन जायेंगे।

  • हमारी कल लड़ाई हुई। मैने अपनी पत्‍नी से कुछ शब्द कहे। उसने मुझसे कुछ अनुच्छेद कहे।

  • शादी से पहले मैं क्या करता था? जो भी दिल चाहा।


और भी...

Saturday, November 4, 2006

मौत का नाटक

जीने के लिये कभी-कभी हमें मौत को भी अपनाना पड़ता है। ये बात इंसानो के लिये प्रत्यक्ष रूप से सही भले ही ना हो, कई जानवरों के लिये जीवन का हिस्सा है। विज्ञान पत्रिका "साइंस न्यूज़" में छपे एक लेख के अनुसार कई प्रजातियाँ भक्षण से बचने के लिये हिंसक जीव के समीप आते ही मौत की चादर औढ़ कर मृत होने का नाटक करने लगतीं हैं। माना जाता है कि शिकारी जानवर को जीवित शिकार में जो मज़ा आता है वो तैयार मिले शिकार में नहीं। क्या शिकारी जानवर इतना बेवकूफ़ हो सकता है कि मौत और मौत के नाटक में अंतर ना बता सके? कुछ वैज्ञानिक इसे शिकार करने के शौक के रूप में समझाते हैं तो कुछ मानते है कि जब अनेक शिकार हों तो शिकारी एक जानवर की मृत्यु की सच्चाई परखने में समय व्यर्थ नही करना चाहता। जब एक परीक्षक ने मृत प्रतीत होगनोज़ को पलट के सीधा किया तो उसने फिर से पेट के बल पलट कर अपने जीवित होने का सबूत दे दिया।

हालांकि ये मृत्यु का आवरण अभी छोटे जानवरों में ही देखा गया है पर ये कई प्रजातियों और जीवों में पाया जाता है। छोटी चिड़ियाँओं, साँपों, मछलियों और कीड़ों, सभी में किसी ना किसी रूप में यह पृवत्ति पाई गई है। होगनोज़ नामाक प्रजाति का साँप अपने भक्षक को देख अपने पेट के बल पलट जाता है और मुँह खोल कर खून की बूँदे टपकाने लगता है। यहाँ तक ये साँप सड़ाँध वाली गंध भी छोड़ता है जो कि शिकारी जानवर के खाने के मज़ा खराब कर देती है। इन सबके बावज़ूद जीववैज्ञानिकों ने पाया कि साँप अपने आसपास के वातावरण से भिज्ञ है और नजरें पलटते से ही हिलने लगता है।

शायद यही जीवजगत की विविधता है कि इतना नाटक करने वाला साँप बुद्धि से थोड़ा कमजोर है। जब एक परीक्षक ने मृत प्रतीत होगनोज़ को पलट के सीधा किया तो उसने फिर से पेट के बल पलट कर अपने जीवित होने का सबूत दे दिया। शायद उसके दिमाग में मरने का नाटक मतलब पेट के बल पलट कर स्थिर हो जाना भरा था, स्थिर बने रहना नही। पर यूरोप के घाँस के मैदानों में पाये जाने वाले साँप इस मामले में ज्यादा समझदार हैं। उनको जब पलटा गया तो भी वे नही हिले।

क्या यह व्यवहार जानवर के जीन्स में होता है? क्या ये उन्हें जीवित रहने में मदद करता है? क्या मौत का नाटक हमेशा मौत से बचने के लिये ही किया जाता है? वैज्ञानिक कई प्रश्नों के साथ इस पृवत्ति को समझने की कोशिश कर रहें है परंतु जीवों के प्रति अन्याय के विरूद्ध नियम-कायदे कुछ महत्वपूर्ण प्रयोग करने के रास्ते में बाधा बन जाते हैं। वर्षों पुराने प्रयोगों से, जब इन कानूनो का जन्म नही हुआ था, वैज्ञानिको ने ये लगभग निश्कर्ष निकाला है कि वास्तव में ये पृवत्ति जीन्स में पायी जाती है और कुछ हद तक शिकारी जानवर के पंजे में आने के बाद जीवित होने की संभावना में वृद्धि करती है। जब एक बिल्ली के पिंजरे में क्विल नामक चिड़ियाँयें छोड़ी गयी तो देखा गया की जैसे ही एक चिड़िया मरने का नाटक करती है बिल्ली उसे छोड़कर दूसरी चिड़िया के पीछे भागने लगती है।

पर यह नही कि मृत शरीर हमेशा शिकार से बचने के ही काम आता है क्योंकि शिकार को तैयार भोजन में मजा नही। जापानी जीवविज्ञानिकों ने एक प्रयोग में मकड़ियों, कीड़ो और मेंढ़कों को टिड्डे खाने के लिये दिये। कथित रूप से जानवरों के प्रति अन्याय के विरोध के नियम कीड़ों पर नहीं लागू होते। इनमे से सिर्फ मेंढ़क ही टिड्डे को निगल कर खाता है और इसी अवस्था में वैज्ञानिको नें देखा कि टिड्डा मेंढ़क के मुँह में जाकर अपने शरीर को अकड़ लेता है। क्यों? कारण यह कि यद्यपि टिड्डा पहले ही अपने भक्षक के मुँह में है, अकड़ने से उसके उगलने में कठनाई और इसीलिये जीवित रहने की संभावना दोनो बढ़ जाई है।

समुद्र की एक मछली की प्रजाति मृत ढोंग बिल्कुल उल्टे कारणों से रचती है। पंद्रह-बीस मिनट तक मृत मछली अपने आस-पास की छोटी मछलियों की हिम्मत बढ़ा देती है यहाँ तक कि छोटी मछलियाँ निश्चल मछली के शरीर को कुतरना तक चालू कर देती है। और फिर मौका देखते से ही मरने का नाटक कर रही मछली जाग उठती है और एक दबोचे में ही...।

है ना दुनिया गजब की?

(संपूर्ण जानकारी विज्ञान समाचार के इस लेख से ली गई है।)

Indian Passport Renewal from USA - A Step by Step Guide [Feb-2026]

This post is intended as working guide for renewing Indian Passport while you are overseas. I had relied extensively on NRI sub-reddit , bes...