शायद मेरी शादी का खयाल दिल मे...नही-नही अभी एसी कोई बात नही है पर मान लीजिये कि हो तो? मान लीजीये कि अप्रवासी भारतीयों की चट-मंगनी-पट-ब्याह की परंपरा का पालन करते हुये मुझे आदेश आ जाये कि इन बीस लड़कियों मे से एक चुन के फंदा बाँध लू तो? शर्त ये है कि हर लड़की को एक बार देखना है और निर्णय लेना है कि बात बनेगी कि नही। अगर बनेगी तो वहीं मूर्हत निकाल के सगाई-शादी तय कर दी जायेगी, और बात नही बनी तो लाईन मे अगली कन्या के घर चाय-पानी पीने चलेंगे। एक बार ना कहने के बाद निर्णय बदलना तो नाक-कटाने के बराबर है सो वो तो विकल्प ही नही। और मैं भी सीधे-साधे इंसान की तरह सबसे बढिया बीवी चाहूँ तो? भई, ये तो समस्या हो गई ना। किस को हाँ करूँ और किस को ना? जल्दी हाँ कर दी तो आने वाले बढ़िया अवसर हाथ से निकल जायेंगे, और देर लगाई तो ना जाने मौका हाथ आते हुये भी ठुकरा दिया हो तो?
कुछ ऐसी ही समस्या सोची होगी ऑपरेशन्स रीसर्च (operations research) वालों ने तभी तो उन्होने 'सुल्तान की दहेज की समस्या' बना डाली। और ये समस्या मियाँ-बीवी ढूढनें के अलावा नौकरी के साक्षात्कार में दस पदाभिलाषियों को चुनने जैसे कामों में भी आती है। आप चाहें तो इसे एक मजेदार खेल भी बना सकते है और अपने मित्रगणों को दिमाग लगाने को मजबूर कर सकते हैं। इस रोचक समस्या का हल भी ज्यादा कठिन नही और जो गणित की और रूझान रकते हो वे व्युत्पत्ति (derivation) के लिये इस लेख (PDF) को पढ़ सकते हैं। विकीपीडिया और ये पन्ना भी देखें। संक्षेप में हल यहाँ प्रस्तुत है:
आप पहले एक-तिहाई पदों में से किसी को ना चुने और इस अवधि में आगे मिलने वाली योग्यता का अनुमान लगायें। एक-तिहाई पदों के बाद उस पहले प्रार्थी को चुने जो कि प्रथम एक-तिहाई के सर्वश्रेष्ठ से भी अधिक पसंदीदा हो। ये मानके चला जा रहा है कि आप हर प्रार्थी को आंक सकते है और किसी मानक के रूप में एक-दूसरे से तुलना कर सकते हैं। इसे तकनीकी भाषा में उपयोगिता फलन (utility function) कहते हैं। तो n लोगो या वस्तुओं मे से सर्वश्रेष्ठ के चुनाव की संभावना तब अधिकतम होगी जब आप n/3 तक किसी को ना चुने और फिर अगला जो भी इनमें से सर्वश्रेष्ठ से बेहतर हो, या फिर अंतिम विकल्प हो, उसे चुने। अब प्रश्न ये है कि भैया जब हमारी होने वाली दुलहनों को ये फ़ॉर्मुला पता लगेगा तो फिर लाईन शुरू करनें के लिये तैयार कौन होगी?
अगर आपको इस तरह की व्यवाहारिक गणित और तर्क (logic) की पहेलियाँ पसंद हो तो इस चिठ्ठे को देखते रहीयेगा।
Tuesday, July 18, 2006
मिले सुर मेरा तुम्हारा
ये संभावना कम ही है कि इस चिठ्ठे के पाठकों ने 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' विडीयो का ये रूपांतरण नही देखा होगा, पर फिर भी यदि आप छूट गयें तो लीजीये आनंद इस कलात्मक ढंग से किये गये चित्रांकन का और 'गुड-ऑल्ड' दूरदर्शन को याद कीजीये। यहाँ जाकर भी यूट्यूब पर देख सकते हैं।
मेरे स्नातकोत्तर विश्वविद्यालय (बॉस्टन स्थित एम आई टी) के छात्रों द्वारा बनाया ये विडीयो पूरी तरह महाविद्यालय परिसर और आसपास चित्रांकित किया गया है सिवाय संगीत और गान के जो कि मेरा अनुमान है कि मौलिक विडीयो से ही लिये गये हैं। अंत मै कोरस गाने वाली भीड़ में मैं भी शामिल हूँ।
MP3 फाईल यहाँ से डाऊनलोड करें।
अगला विडीयो भी यादों को गोता लगवाने वाला है। जब टी वी पे आता था तो इसकी बखत नही होती थी पर अब नही आता है तो याद बन जाता है , है ना अजीब हमारी आदत भी? इसे भी यूट्यूब पे देखें।
मेरे स्नातकोत्तर विश्वविद्यालय (बॉस्टन स्थित एम आई टी) के छात्रों द्वारा बनाया ये विडीयो पूरी तरह महाविद्यालय परिसर और आसपास चित्रांकित किया गया है सिवाय संगीत और गान के जो कि मेरा अनुमान है कि मौलिक विडीयो से ही लिये गये हैं। अंत मै कोरस गाने वाली भीड़ में मैं भी शामिल हूँ।
MP3 फाईल यहाँ से डाऊनलोड करें।
अगला विडीयो भी यादों को गोता लगवाने वाला है। जब टी वी पे आता था तो इसकी बखत नही होती थी पर अब नही आता है तो याद बन जाता है , है ना अजीब हमारी आदत भी? इसे भी यूट्यूब पे देखें।
Saturday, July 15, 2006
लगभग हर चीज का लघु इतिहास
ये लेख मेरे पुराने अंग्रेजी के चिठ्ठे ले लिया गया है, और बिल ब्रायसन की नई (अंग्रेजी) पुस्तक "लगभग हर चीज का लघु इतिहास" (short history of nearly every thing) का अवलोकन करने का प्रयास है। ये पुस्तक विज्ञान में रुची रखनें वालों के लिये खज़ाना है, और मेरी और से जरूर पढ़े की श्रेणी में आती है। तो शुरू करता हूँ इसकी बढ़ाई!
अभी ही इस पुस्तक को पढ़कर खत्म किया, और अनुभव, संक्षेप में नम्र कर देने वाला रहा। "लगभग हर चीज का लघु इतिहास" नामक ये पुस्तक अपने नाम पे शत-प्रतिशत खरा उतरती है। लेखक समय के आरंभ से अब तक होने वाले विज्ञान के मुख्य क्षेत्रो, जैसे की भौतिकी (physics), रसायनशास्त्र (chemistry), खगोल विद्या (astronomy), भूगर्भ विद्या (geology), जीवाश्मिकी (palaeontology), समुद्र शोध (oceanography), जीव विज्ञान (biology), आदि के समस्त इतिहास की प्रमुख घटनाओं को साधारण आदमी की भाषा में बड़ी ही सरलता से समझाता है। ब्रम्हांड, पृथ्वी, मानवता और विज्ञान की लंबी यात्रा, और हमें जो पता है और कैसे पता है का विस्तृत विश्लेषण, बिग-बैंग[१] (big bang) से लेकर ईक्कीसवीं शताब्दी तक बड़े ही रोचक और आश्चर्यचकित ढंग से इन ५०० पन्नो में समेटा गया है। एक अतुलनीय पठन, निश्चित ही।
पुस्तक शुरू करने से पहले मैरा ये सोचना था कि शायद पुस्तक दुनिया और जीवन का इतिहास तथ्यों के माध्यम से प्रस्तुत करेगी, परंतु बिल ने कहानी को कई वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, खोजकर्ताओं और आविष्कारकों की दृष्टी से प्रस्तुत किया, और इस तरह से लेखन को शैक्षित ही नही बल्कि दिल छू लेने वाला भी बना दिया। और अंत में हर चीज की विशालता और विस्तीर्णता, संपूर्ण ब्रंम्हाड की उपयोगिता (अथवा अनुपयोगिता), और हम इंसानो की उपस्थिती की व्यर्थता कंपा देने वाली है। शायद कुछ निराशा भी होती है क्योंकि मानव ने सदा ही अपने जीवन का अर्थ ढूंढने का प्रयास किया है, और इसी विचार से कई दर्शनशास्त्रों का निर्माण और सतत विवाद किया है, जबकि किताब द्वारा हमें शब्दों को बिना घुमा-फिरा कर बताया गया है कि अर्थ कुछ भी नही है। कुछ भी नही। शून्य। हमारी धरती पर उपस्थिती केवल संयोगवश है, भाग्य के अगनित कर्मों का एक छोटा से हिस्सा। यही नही, हर चीज के इतिहास मे हमारी हस्ती अरबों-खरबों जीव-जंतुयों के समान नगण्य है। इंसान का कोई उपयोग नही, उद्देश्य नही, अस्तित्व नही, गिनती नही। शायद केवल, और इंसान पैदा करने के।
पुस्तक की शुरूआत होती है बिग-बैंग में समय की शुरूआत के साथ, और पदार्थ, ब्रम्हांड, अंतरिक्ष, आकाशगंगायें और पृथ्वी बनने से[२]। कहानी कालानुक्रमिक नही है क्योंकि विज्ञान की अनेक विधाओं मे शोध समांतर होते रहे, पर फिर भी समझने में सरल और उत्सुकतापूर्वक है। लेखन का विशेष लक्षण ये नही कि घटनाओं को उसी क्रम में दर्शाया जिस क्रम में वो हुई हों, पर ये हैं कि घटनाओं को उसी क्रम में प्रस्तुत किया गया जिस क्रम में उन्हे खोजा गया था। साथ ही समकालीन समाज के लोगों और संबंधित व्यक्तिओं की सनकों पर सटीक टिप्पणी की गई है और झलक दिखलाई गई है। लेखक नें भूगर्भ विद्या और जीवाश्मिकी का समन्वय, जीवविज्ञान और जिन्दगी का जोड़, ब्रम्हांड का विस्तार और जीवों का विकास (evolution), और हर किसी चीज का हर किसी चीज से संबंध का ऐसा जाल बुना है कि बस। पढ़नें के दौरान हम उन मशहूर विचारकों और अनुसंधानकर्ताओं के समय में यात्रा करतें हैं, उनके दुख और खुशियों में शामिल होते हैं, मानवता की जीत और हार से रूबरू होते हैं और मानव चरित्र का सुंदर और भद्दा चेहरा देखतें है।
हमे पता चलता है कि विज्ञान बहुत ही कठिन कार्य है। इतना कठिन कि आप सोच भी नही सकते। इतना कठिन की हमें आज की दुनिया में आश्चर्य होता है। लोग अपनी पूरी जिंदगी लगा देते है उस काम में जिसके पूरा करते ही उसे ठुकरा दिया जायेगा, प्रश्न उठायें जायेंगे, या फिर खण्डित कर दिया जायेगा। वे राजनीति के खेल, युद्धों के नुकसान, धन और साधनों की कमी से जूझते हैं। समकालील वैज्ञानिकों द्वारा विरोध किये जाते हैं, परिवार वालों की प्रताड़ना सहतें हैं और सामाजिक अंधविश्वासों का शिकार बनते हैं। कई मानवता को ज्ञान का सुंदर तोहफ़ा देने के बावजूद भी बिना नाम के, बिना श्रेय के, और अपने काम के श्रेय को दूसरे के नाम पर मड़ दिये जाने पर मर जाते है। कई केवल अपनी इच्छा शक्ति की वजह से तीव्र गरीबी से उठकर कुछ कर दिखाते है तो कई की बुद्धिमानी की सीमा से इतना आगे सोचते हैं कि उनकी सोच को समझना भी मुश्किल होता है। अपने शोध की लगन में कई अपनी जान की परवाह तक नही करते। हम जो भी जानते है उनकी वजह से जानते हैं, उस उन मे से कई को हम धन्यवाद भी नही कर सकते या ये भी पता नही कि करें भी तो किसे? ऐसे मे एक उदाहरण उठाना अन्याय ही प्रतीत होता है पर समझाने के लिये एक घटना बताता हूँ। एक वैज्ञानिक नें हिम-युगों (ice age) के काल की गणना करने के लिये पृथ्वी के सूर्य के चारों और चक्कर लगानें की गणना हेतु अपनी जिंदगी के बीस वर्ष उस सारणी बनाने में लगा दिये जो कि आधुनिक संगणकों के द्वारा बीस मिनिट से भी कम समय में पूरा की जा सकता है।
लेखक ने एक टिप्पणी उद्धृत की है कि वैज्ञानिक खोजें तीन चरणों की प्रक्रिया से गुजरती हैं। सर्वप्रथम, उनके सत्य पर प्रश्न उठाया जाता है, तदांतर उनकी उपयोगिता शक की जाती है, और जब आप ये सिद्ध कर दो कि ये उपयोगी खोज सच है तो वो गलत व्यक्ति को श्रेयित कर दी जाती है। कितना सघन कथन है यह? इस किताब को पढ़ने के बाद हमे ये पता चलता है कि कितने बुद्धिजीवि व्यर्थ हो गये क्योंकि उनके सहयोगियों ने उनका साथ नही दिया और नुकसान पहुँचाया, कि धार्मिक कट्टरता और रूढ़ीवादी समाज की वजह से कितना वैज्ञानिक विकास अवरुद्ध हुआ।
लेखक ने संसार के अकल्पनीय आयामों की महत्वता के लिये उनकी साधारण पदार्थों से बार-बार तुलना की है। अणु और बैक्टेरिया की क्रिकेट की गेंद से और ब्रम्हांड की संयुक्त राज्य अमेरिका के क्षेत्रफल से तुलना करके लेखन ने क्षितिज के अकल्पनीय विस्तार और परमाणु जगत की अर्थहीन अल्पता को हमे समझाने की कोशिश की है। पहाड़ो की ऊँचाई, सागर की गहराई, अंतरिक्ष का विस्तार, आकाशगंगाओं की गति, अगणित बैक्टिरियों की लगभग हर जगह सर्वशक्तिशाली जिंदगी (विशेष रूप से जब कुल मिलाकर देखें तो), हर चीज की जटिलता और साथ ही साथ अर्थहीनता...दुनिया बड़ी अजीब है।
कुलमिलाकर एक मजेदार पुस्तक जो लाखों उत्तर देती है और लाखों प्रश्न भी उठाती है जिनके जवाब पाने के लिये हमे विज्ञान के तरक्की करनें का इंतजार करना होगा, जो कि, संभवतः हमारी-तुम्हारी जिंदगी मे ना हो। क्योंकि जब १६०० ईसा-पूर्व से अभी तक की वैज्ञानिक खोजों का सार एक ५०० पन्नो की किताब में लिख दिया जाता है और एक-दो दिन में पढ़ लिया जाता है तो दिमाग जानकारी की अधिकता से अभिभुत हो जाता है और उन उन प्रश्नों के हल ढूँढ़ता है जिनके जवाब हमे, बदकिस्मती से अगले ५० पन्नों मे नही मिलेंगे, जैसे कि अभी तक मिल रहे थे।
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↑[१] बिग-बैंग उस धमाके कहते है जिससे माना जाता है कि हमारे ब्रम्हांड की शुरूआत हुई थी।
↑[२] ब्रम्हांड लगभग १३.५ अरब वर्षों पहले, सौर्य मण्डल लगभग ६ अरब वर्षों पहले, पृथ्वी लगभग ४.५ अरब वर्षों पहले, और जीवन की शुरूआत लगभग ३.५ अरब वर्षों पहले हुई। मानव का अस्तित्व २ लाख साल से कम पुराना है।
अभी ही इस पुस्तक को पढ़कर खत्म किया, और अनुभव, संक्षेप में नम्र कर देने वाला रहा। "लगभग हर चीज का लघु इतिहास" नामक ये पुस्तक अपने नाम पे शत-प्रतिशत खरा उतरती है। लेखक समय के आरंभ से अब तक होने वाले विज्ञान के मुख्य क्षेत्रो, जैसे की भौतिकी (physics), रसायनशास्त्र (chemistry), खगोल विद्या (astronomy), भूगर्भ विद्या (geology), जीवाश्मिकी (palaeontology), समुद्र शोध (oceanography), जीव विज्ञान (biology), आदि के समस्त इतिहास की प्रमुख घटनाओं को साधारण आदमी की भाषा में बड़ी ही सरलता से समझाता है। ब्रम्हांड, पृथ्वी, मानवता और विज्ञान की लंबी यात्रा, और हमें जो पता है और कैसे पता है का विस्तृत विश्लेषण, बिग-बैंग[१] (big bang) से लेकर ईक्कीसवीं शताब्दी तक बड़े ही रोचक और आश्चर्यचकित ढंग से इन ५०० पन्नो में समेटा गया है। एक अतुलनीय पठन, निश्चित ही।
पुस्तक शुरू करने से पहले मैरा ये सोचना था कि शायद पुस्तक दुनिया और जीवन का इतिहास तथ्यों के माध्यम से प्रस्तुत करेगी, परंतु बिल ने कहानी को कई वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, खोजकर्ताओं और आविष्कारकों की दृष्टी से प्रस्तुत किया, और इस तरह से लेखन को शैक्षित ही नही बल्कि दिल छू लेने वाला भी बना दिया। और अंत में हर चीज की विशालता और विस्तीर्णता, संपूर्ण ब्रंम्हाड की उपयोगिता (अथवा अनुपयोगिता), और हम इंसानो की उपस्थिती की व्यर्थता कंपा देने वाली है। शायद कुछ निराशा भी होती है क्योंकि मानव ने सदा ही अपने जीवन का अर्थ ढूंढने का प्रयास किया है, और इसी विचार से कई दर्शनशास्त्रों का निर्माण और सतत विवाद किया है, जबकि किताब द्वारा हमें शब्दों को बिना घुमा-फिरा कर बताया गया है कि अर्थ कुछ भी नही है। कुछ भी नही। शून्य। हमारी धरती पर उपस्थिती केवल संयोगवश है, भाग्य के अगनित कर्मों का एक छोटा से हिस्सा। यही नही, हर चीज के इतिहास मे हमारी हस्ती अरबों-खरबों जीव-जंतुयों के समान नगण्य है। इंसान का कोई उपयोग नही, उद्देश्य नही, अस्तित्व नही, गिनती नही। शायद केवल, और इंसान पैदा करने के।
पुस्तक की शुरूआत होती है बिग-बैंग में समय की शुरूआत के साथ, और पदार्थ, ब्रम्हांड, अंतरिक्ष, आकाशगंगायें और पृथ्वी बनने से[२]। कहानी कालानुक्रमिक नही है क्योंकि विज्ञान की अनेक विधाओं मे शोध समांतर होते रहे, पर फिर भी समझने में सरल और उत्सुकतापूर्वक है। लेखन का विशेष लक्षण ये नही कि घटनाओं को उसी क्रम में दर्शाया जिस क्रम में वो हुई हों, पर ये हैं कि घटनाओं को उसी क्रम में प्रस्तुत किया गया जिस क्रम में उन्हे खोजा गया था। साथ ही समकालीन समाज के लोगों और संबंधित व्यक्तिओं की सनकों पर सटीक टिप्पणी की गई है और झलक दिखलाई गई है। लेखक नें भूगर्भ विद्या और जीवाश्मिकी का समन्वय, जीवविज्ञान और जिन्दगी का जोड़, ब्रम्हांड का विस्तार और जीवों का विकास (evolution), और हर किसी चीज का हर किसी चीज से संबंध का ऐसा जाल बुना है कि बस। पढ़नें के दौरान हम उन मशहूर विचारकों और अनुसंधानकर्ताओं के समय में यात्रा करतें हैं, उनके दुख और खुशियों में शामिल होते हैं, मानवता की जीत और हार से रूबरू होते हैं और मानव चरित्र का सुंदर और भद्दा चेहरा देखतें है।
हमे पता चलता है कि विज्ञान बहुत ही कठिन कार्य है। इतना कठिन कि आप सोच भी नही सकते। इतना कठिन की हमें आज की दुनिया में आश्चर्य होता है। लोग अपनी पूरी जिंदगी लगा देते है उस काम में जिसके पूरा करते ही उसे ठुकरा दिया जायेगा, प्रश्न उठायें जायेंगे, या फिर खण्डित कर दिया जायेगा। वे राजनीति के खेल, युद्धों के नुकसान, धन और साधनों की कमी से जूझते हैं। समकालील वैज्ञानिकों द्वारा विरोध किये जाते हैं, परिवार वालों की प्रताड़ना सहतें हैं और सामाजिक अंधविश्वासों का शिकार बनते हैं। कई मानवता को ज्ञान का सुंदर तोहफ़ा देने के बावजूद भी बिना नाम के, बिना श्रेय के, और अपने काम के श्रेय को दूसरे के नाम पर मड़ दिये जाने पर मर जाते है। कई केवल अपनी इच्छा शक्ति की वजह से तीव्र गरीबी से उठकर कुछ कर दिखाते है तो कई की बुद्धिमानी की सीमा से इतना आगे सोचते हैं कि उनकी सोच को समझना भी मुश्किल होता है। अपने शोध की लगन में कई अपनी जान की परवाह तक नही करते। हम जो भी जानते है उनकी वजह से जानते हैं, उस उन मे से कई को हम धन्यवाद भी नही कर सकते या ये भी पता नही कि करें भी तो किसे? ऐसे मे एक उदाहरण उठाना अन्याय ही प्रतीत होता है पर समझाने के लिये एक घटना बताता हूँ। एक वैज्ञानिक नें हिम-युगों (ice age) के काल की गणना करने के लिये पृथ्वी के सूर्य के चारों और चक्कर लगानें की गणना हेतु अपनी जिंदगी के बीस वर्ष उस सारणी बनाने में लगा दिये जो कि आधुनिक संगणकों के द्वारा बीस मिनिट से भी कम समय में पूरा की जा सकता है।
लेखक ने एक टिप्पणी उद्धृत की है कि वैज्ञानिक खोजें तीन चरणों की प्रक्रिया से गुजरती हैं। सर्वप्रथम, उनके सत्य पर प्रश्न उठाया जाता है, तदांतर उनकी उपयोगिता शक की जाती है, और जब आप ये सिद्ध कर दो कि ये उपयोगी खोज सच है तो वो गलत व्यक्ति को श्रेयित कर दी जाती है। कितना सघन कथन है यह? इस किताब को पढ़ने के बाद हमे ये पता चलता है कि कितने बुद्धिजीवि व्यर्थ हो गये क्योंकि उनके सहयोगियों ने उनका साथ नही दिया और नुकसान पहुँचाया, कि धार्मिक कट्टरता और रूढ़ीवादी समाज की वजह से कितना वैज्ञानिक विकास अवरुद्ध हुआ।
लेखक ने संसार के अकल्पनीय आयामों की महत्वता के लिये उनकी साधारण पदार्थों से बार-बार तुलना की है। अणु और बैक्टेरिया की क्रिकेट की गेंद से और ब्रम्हांड की संयुक्त राज्य अमेरिका के क्षेत्रफल से तुलना करके लेखन ने क्षितिज के अकल्पनीय विस्तार और परमाणु जगत की अर्थहीन अल्पता को हमे समझाने की कोशिश की है। पहाड़ो की ऊँचाई, सागर की गहराई, अंतरिक्ष का विस्तार, आकाशगंगाओं की गति, अगणित बैक्टिरियों की लगभग हर जगह सर्वशक्तिशाली जिंदगी (विशेष रूप से जब कुल मिलाकर देखें तो), हर चीज की जटिलता और साथ ही साथ अर्थहीनता...दुनिया बड़ी अजीब है।
कुलमिलाकर एक मजेदार पुस्तक जो लाखों उत्तर देती है और लाखों प्रश्न भी उठाती है जिनके जवाब पाने के लिये हमे विज्ञान के तरक्की करनें का इंतजार करना होगा, जो कि, संभवतः हमारी-तुम्हारी जिंदगी मे ना हो। क्योंकि जब १६०० ईसा-पूर्व से अभी तक की वैज्ञानिक खोजों का सार एक ५०० पन्नो की किताब में लिख दिया जाता है और एक-दो दिन में पढ़ लिया जाता है तो दिमाग जानकारी की अधिकता से अभिभुत हो जाता है और उन उन प्रश्नों के हल ढूँढ़ता है जिनके जवाब हमे, बदकिस्मती से अगले ५० पन्नों मे नही मिलेंगे, जैसे कि अभी तक मिल रहे थे।
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↑[१] बिग-बैंग उस धमाके कहते है जिससे माना जाता है कि हमारे ब्रम्हांड की शुरूआत हुई थी।
↑[२] ब्रम्हांड लगभग १३.५ अरब वर्षों पहले, सौर्य मण्डल लगभग ६ अरब वर्षों पहले, पृथ्वी लगभग ४.५ अरब वर्षों पहले, और जीवन की शुरूआत लगभग ३.५ अरब वर्षों पहले हुई। मानव का अस्तित्व २ लाख साल से कम पुराना है।
Saturday, July 8, 2006
क्यों होता है जिंदगी के साथ
कोई कितना भी अच्छा क्यों ना करे, उसके प्रति लोगों का व्यवहार उसके एक बुरा करने पर ही उलट जाता है। सभी लोग जानते हैं कि अगर कोई हमेशा ही आपके साथ अच्छाई करता है और जाने या अनजाने में एक बुराई कर देता है, तब भी उसकी अच्छाईयाँ उसकी बुराईयों से कई गुना भारी हैं। लेकिन फिर भी क्यों लोगों का नज़रिया तुरंत ही पलट जाता है? ऐसे अनेकानेक उदाहरण हर किसी को व्यग्तिगत और सार्वजनिक जीवन में मिल जायेगें। सचिन तेंदुलकर जब तक शतक पर शतक लगाकर भारत का नाम रोशन करता रहा तब तक तो वो भगवान बना लिया गया और जब उसके खेल में थोड़ी सी कमी आई वो तुरंत राक्षस बन गया। जो लोग कुछ दिनों पहले उसकी प्रशंसा करते नही थकते थे वो अब उसको जूते मारने के मौके ढूँढ रहे हैं।
और फिर बात सचिन की ही क्यों, कितनें दोस्तों को मैनें अनंत बार महाविद्यालय में अपने नोट्स देकर मदद की, और किसी कारण से एक को नही दिया (जो कि मेरी दृष्टि में सही था) तो तुरंत ही सबके बीच मतलबी कहकर बदनाम कर दिया गया। निश्चित ही ऐसा एक ही हादसा नही है। कभी तो ऐसा लगता है कि सबके लिये अच्छा इंसान बनना कठिन ही नही असंभव है। और अब जैसे और लोगो के अनुभव पढ़ता हूँ तो ऐसा सुनिश्चित ही लगता है कि कोई कितना भी महान आदमी हो उसकी भी कोई ना कोई बुराई करनें वाला जरूर मिल जायेगा, फिर मैं किस खेत की मूली हूँ। और यह भी कटु सत्य है कि ये समस्त बातें मुझ पर भी लागू होती हैं।
क्यों होता है ये जिंदगी के साथ कि आपकी एक छोटी सी गलती दुनिया की नज़रों में आपके द्वारा किये गये अनंत पुण्यों को धो डालती है और जिसका दाग भविष्य मे किये गयें अनेक पुण्य भी नही मिटा पाते?
और फिर बात सचिन की ही क्यों, कितनें दोस्तों को मैनें अनंत बार महाविद्यालय में अपने नोट्स देकर मदद की, और किसी कारण से एक को नही दिया (जो कि मेरी दृष्टि में सही था) तो तुरंत ही सबके बीच मतलबी कहकर बदनाम कर दिया गया। निश्चित ही ऐसा एक ही हादसा नही है। कभी तो ऐसा लगता है कि सबके लिये अच्छा इंसान बनना कठिन ही नही असंभव है। और अब जैसे और लोगो के अनुभव पढ़ता हूँ तो ऐसा सुनिश्चित ही लगता है कि कोई कितना भी महान आदमी हो उसकी भी कोई ना कोई बुराई करनें वाला जरूर मिल जायेगा, फिर मैं किस खेत की मूली हूँ। और यह भी कटु सत्य है कि ये समस्त बातें मुझ पर भी लागू होती हैं।
क्यों होता है ये जिंदगी के साथ कि आपकी एक छोटी सी गलती दुनिया की नज़रों में आपके द्वारा किये गये अनंत पुण्यों को धो डालती है और जिसका दाग भविष्य मे किये गयें अनेक पुण्य भी नही मिटा पाते?
Monday, June 26, 2006
फायर-फॉक्स - पुरानी खबर?
जानता हूँ कि ये अब पुरानी खबर है फिर भी सच्चाई तो सच्चाई ही है, और सच यह है कि आज के समय में मॉज़िला फायर-फॉक्स से बेहतर वेब-ब्राऊज़र नही। और बात सिर्फ टैब्ड ब्राऊज़िंग की ही नही - वो तो ऑपेरा, नेटस्केप, और नये आने वाले ईन्टर्नेट एक्सप्रलोरर में भी है। बात तो बहुत सी बातों के खूबसूरत जोड़ की है। टैब्स के साथ कई अन्य अतिरिक्त फीचर्स हैं, वास्तव की हर ज़रूरत के लिये, जो कि आपके अंतर्जाल भ्रमण के अनुभव में चार नहीं चालीस चाँद लगा देते है। बिना जगह घेरने वाले टूल-बारों के कई सर्च-ईजिंन की सुविधा, मनमोहक रंग-रूप की थीम, और अगणित एड-ऑन। एड-ऑन ये फीचर होता है फयर-फॉक्स में जिससे आप अपनी सुविधा अनुसार अपने ब्राऊज़र की खूबियाँ और फंक्शनालिटीज़ घटा-बढ़ा सकतें हैं।
अगर आपने चूहे-के-ईशारों (माऊस-गेस्चर्स) के बारे में नही सुना तो आप वेब-ब्राऊज़िंग की दुनियाँ के पाषांण युग में जी रहें हैं - ऐसी लत लगी है इसकी तो कि क्लिक करनें में भी आलस आने लगा है अब। माऊस-गेस्चर्स वो होता है जिसमे कई सामान्य प्रक्रियायें, जैसे कि वापस जाना (बैक), पन्ना पुनः लॉड करना, खोलना-बंद करना, और जाने क्या-क्या के लिये क्लिक करनें की जरूरत नही, सिर्फ माऊस को घुमा देना ही काफी है।
हाँलाकि अतिरिक्त एड-ऑन तो अपनी जरूरत के हिसाब से आप इंस्टाल कर ही सकतें है, मैनें जो उपयोगीं पायें उनकी सूची प्रस्तुत है:
आप इन एड-ऑन को इंस्टाल करने के लिये यहाँ जाकर दिये गये नाम से खोजें। यहाँ भी जाईये, बहुत से अतिउपयोगी एड-ऑन की सूची बना रखी है।
अगर आपने चूहे-के-ईशारों (माऊस-गेस्चर्स) के बारे में नही सुना तो आप वेब-ब्राऊज़िंग की दुनियाँ के पाषांण युग में जी रहें हैं - ऐसी लत लगी है इसकी तो कि क्लिक करनें में भी आलस आने लगा है अब। माऊस-गेस्चर्स वो होता है जिसमे कई सामान्य प्रक्रियायें, जैसे कि वापस जाना (बैक), पन्ना पुनः लॉड करना, खोलना-बंद करना, और जाने क्या-क्या के लिये क्लिक करनें की जरूरत नही, सिर्फ माऊस को घुमा देना ही काफी है।
हाँलाकि अतिरिक्त एड-ऑन तो अपनी जरूरत के हिसाब से आप इंस्टाल कर ही सकतें है, मैनें जो उपयोगीं पायें उनकी सूची प्रस्तुत है:
- टॉकबैक (Talkback) - ये किसी कारण से यदि फायर-फॉक्स क्रेश कर जाये तो उसकी सूचना बनाने वाली टीम को देने के लिये है, जिससे कि वो खामियों का विश्लेषण कर उसको सुधारने की कोशिष करें। ये उपयोगकर्ता के सीधे काम का नही और इसकों इंस्टाल करनें की भी ज़रूरत नही क्योंकि ये खुद-बखुद ही इंस्टाल हो जाता है।
- पी डी एफ डाऊनलॉड (PDF Download) - अगर आप अंतर्जाल से किसी पी डी एफ फाईल को डाऊनलॉड करतें हैं, अथवा बिना कंप्यूटर पे उतारे ही ब्राऊज़र में ही देखना चाहतें हैं तो यह उप्योगी है।
- आई ई व्यू (IE View) - जैसा कि आप अब तक समझ ही गये होंगे कि हिन्दी ईन्टर्नेंट एक्सप्लोरर के ब्राऊज़रों मे ही शुद्ध दिखती है, और कई जालपृष्ठ आप आई ई मे खोलना चाहें तो फयर-फ़ॉक्स से सीधा कड़ी को आई ई मे खोल सकतें हैं बिना यू आर एल कॉपी करे। पर ध्यान दें, इसका ज्यादा उपयोग ना करें वरना फयर-फॉक्स को इस्तेमाल का फायदा ही क्या?
- वन क्लिक वेदर (1-ClickWeather) - अपने ब्रऊज़र पे ही मौसम की ताज़ा जानकारी पाईये।
- याहू फ़ोटो अपलोड टूल (Yahoo! Photos Easy Upload Tool) - अगर आप याहू! पे तस्वीरें अपलॉड करतें है तो ये लाभकर हो सकता है।
- कस्टमाईज़ गूगल (Customize Google) - अगर चाहें तो गूगल में विज्ञापन इत्यादि को प्रतिबंधित कर सकते हैं।
- ग्रीज़ मंकी (Greasemonkey) - ये सुविधा कई अन्य सुविधाओं का द्वार है। ग्रीज़ मंकी कई स्क्रिप्ट चलाने में मदद करता है जो कि कई वेबसाईटों मे सुविधा के फीचर और प्रारूप आपकी पसंद के अनुसार ढाल सकतीं हैं।
- गूगल सेफ़ ब्राऊज़िंग (Google Safe Browsing) - फिशिंग के हमले से बचनें का शौक हो तो इसका उपयोग करें।
- टैब मिक्स प्लस (Tab Mix Plus) - यह बहुत ही महत्वपूर्ण सुविधा है जिससे आप टैब्स के कई सैटिंग्स बदल सकते हैं और अपने अनुभव को और भी आसान बना सकतें हैं। उदाहरणतः टैब बदलनें के लिये टैब पे माऊस रख देना भर, और पेज़ के लोड होने की प्रोग्रेस दिखना।
- ऑल-इन-वन गेस्चर्स (All-in-One Gestures) - और यह है ताज मे सितारा, शहंशाहों का शहंशाह, माऊस गेस्चर्स। अब ब्राऊज़ करने के कामों, जैसे टैब खोलना-बंद करना, कड़ी को नई खिड़की या नई टैब पे खोलना, पीछे और आगे जाना, री-लोड या खिड़की छोटा (मिनिमाईज़) करना, कोड, कूकीज़ देखना, और भी जाने क्या-क्या सब कलई की एक लचक से संभव।
- डॉऊन देम ऑल (DownThemAll!) - अगर किसी पन्ने से कई कड़ीयाँ एक साथ डाऊनलॉड करनी तो अब हर किसी पे एक-एक कर क्लिक करनें की ज़रूरत नही। ये खुद-बखुद ही कड़ियाँ चुन लेगा आपके लिये।
- आई ई टैब (IE Tab) - आई ई व्यू की तरह ही आई ई टैब भी किसी भी पन्ने को हिन्दी में दर्शाता है पर इसमे आप फयर-फॉक्स के टैब में ही ईन्टर्नेट एक्सप्लोरर खोल सकते हैं और अतिरिक्त खिड़की खोलने की आवश्यक्ता नही।
- गूगल नोटबुक (Google Notebook) - यदि गूगल नोटबुक के उपयोग्कर्ता हैं तो किसी भी पन्ने से सीधे सेलेक्ट कर नोटबुक में लिख सकतें हैं।
- पर्फोर्मेंसिंग (Performancing) - ये सुविधा ब्लॉगिंग के शौकीनों के लिये काफी उपयोगी है, किसी भी पन्ने से सीधे अपनें किसी भी ब्लॉग पे लेख लिख सकतें हैं।
आप इन एड-ऑन को इंस्टाल करने के लिये यहाँ जाकर दिये गये नाम से खोजें। यहाँ भी जाईये, बहुत से अतिउपयोगी एड-ऑन की सूची बना रखी है।
Sunday, June 25, 2006
दसों दिशाओं मे जायें
ये बहुत ही सुंदर गीत मिला कूलगूज़ पे (जहाँ से आप कई हिन्दीं फिल्मीं गीत डॉऊनलोड कर सकतें हैं) - देशभक्ति का गीत है, हांलाकि मुझे पता नही किस चलचित्र का है या फिर किसी का है भी कि नही। जो भी हो, इसकी पंक्तियाँ बहुत ही लयबद्ध और जोशवाली है। उन्हीं को यहाँ लिख रहाँ हूँ:
गाना यहाँ से डॉऊनलॉड कर सकतें हैं।
दसों दिशाओं में जायें, दल-बादल से छा जायें - ३
उमड़-घुमड़ के इस धरती को - २
नंदन वन सा लहरायें - २
दसों दिशाओं में जायें, दल-बादल से छा जायें - २
उमड़-घुमड़ के इस धरती को - २
नंदन वन सा लहरायें - २
यह मत समझो, किसी क्षेत्र को, खाली रह जानें देगें - २
दानवता की बेल विषय में, कहीं नहीं छाने देगें - २
जहाँ कहीं लू झुलसाती - ४
अमृत रिमझिम बरसायें - २
दसों दिशाओं में जायें...
फूल सी कोमल खेती पर हम, बिज़ली नही गिरातें हैं - २
किंतु अड़ेले बालू टीले, वर्षा में ढह जाते हैं - २
ध्वंस हमारा काम नहीं - ४
अविरल जीवन सरसायें - २
दसों दिशाओं में जायें...
मानव जीवन, की स्वतंत्रता, नष्ट नही होने पाये - २
यंत्र व्यवस्था, रजयहीन मे, स्वत्व नही खोने पाये - २
जीवन स्तर का, अर्थ ना हम -४
भोग डगर में भरमायें - २
दसों दिशाओं में जायें...
दसों दिशाओं में जायें, दल-बादल से छा जायें - २
| Daso Dishaon Mein ... |
गाना यहाँ से डॉऊनलॉड कर सकतें हैं।
प्याज़ खाया?
अगर नही तो आप बहुत कुछ खो रहें हैं। इस पागल ज़माने में, हमेशा दुःख भरी खबरों को छापने वाले समाचार जगत में, और दिन-प्रतिदिन मानव के मूल्यों के और भी नीचें गिरने के समाचारों के बीच अगर दिल खोल के हंसना हो तो प्याज़...मेरा मतलब ऑनियन पर जरूर जाईये। ठहाके के साथ आप लिखने वाले के हास्यभाव पर भी लाज़वाब हो जायेगें।
शुभारंभ
ॐ
आज से मैनें भी अपना हिन्दी का चिठ्ठा शुरू कर लिया है। सब कुछ अच्छा रहा तो कुछ लिखूंगा भी सही। यहाँ पर मैं अपने लेखों के माध्य्मों से आपको अपनी जिन्दगी की कतरनें प्रस्तुत करूंगा। मेरा पहले एक अंग्रेजी का चिठ्ठा भी है जिस पर अब लिखना बहुत ही कम सा हो गया है इसलिये आशा करता हूँ कि इस चिठ्ठे के वो हाल ना हो तो ही भला।
हालांकि आपने नही पूछा पर मैं बता ही देता हूँ कि जब मैं आपके साथ अपनी जिन्दगी की किताब की कतरनें बांटता हूँ तो इसका मतलब ये नही कि मैने अपनी जिन्दगी की किताब के चिन्दे-चिन्दे कर दिये। बिना किताब के जिन्दगी कैसे रहेगी आखिर? ये तो कुछ अंश हैं जिनको बांटने से, ये आशा है, हमारी और आपकी जिन्दगी दोनो मनोरंजक हो जायेगी। मुझे कतरनें शब्द अच्छा लगा तो बस वही चिठ्ठे का शीर्षक बना लिया। तो इसी के साथ मैं अपने ब्लॉग का दायरा घोषित करनें की कोशिश करता हूँ। जैसे कि हर चिठ्ठे पे होता है, उसी तरह ये चिठ्ठा मेरे विचारों का प्रतिबिंब बनकर मेरे भावों को शब्दारूप देगा। लेखों का संदर्भ मुख्यतः मेरी निजी जिन्दगी, राजनीती, हिन्दी और अंग्रेजी फिल्में, नई पुरानी खबरें, तथा अन्य ब्लॉग पर चल रही चर्चा के मामले रहेंगे। अपने काम या व्यक्तिगत जीवन की ज्यादा बातें सरे-आम डालना मुनासिब नही समझता, क्योंकि सुना है कि आजकल कंपनियाँ नये लोगो को नौकरी देने से पहले उनके नाम की गूगल पे जाँच-पड़ताल करती है और मैं नही चाहूँगा कि मेरी किसी क्षण के विचार मेरे भविष्य में बाधा पहुँचाने वालों के हाथ हथियार बनें।
आज से मैनें भी अपना हिन्दी का चिठ्ठा शुरू कर लिया है। सब कुछ अच्छा रहा तो कुछ लिखूंगा भी सही। यहाँ पर मैं अपने लेखों के माध्य्मों से आपको अपनी जिन्दगी की कतरनें प्रस्तुत करूंगा। मेरा पहले एक अंग्रेजी का चिठ्ठा भी है जिस पर अब लिखना बहुत ही कम सा हो गया है इसलिये आशा करता हूँ कि इस चिठ्ठे के वो हाल ना हो तो ही भला।
हालांकि आपने नही पूछा पर मैं बता ही देता हूँ कि जब मैं आपके साथ अपनी जिन्दगी की किताब की कतरनें बांटता हूँ तो इसका मतलब ये नही कि मैने अपनी जिन्दगी की किताब के चिन्दे-चिन्दे कर दिये। बिना किताब के जिन्दगी कैसे रहेगी आखिर? ये तो कुछ अंश हैं जिनको बांटने से, ये आशा है, हमारी और आपकी जिन्दगी दोनो मनोरंजक हो जायेगी। मुझे कतरनें शब्द अच्छा लगा तो बस वही चिठ्ठे का शीर्षक बना लिया। तो इसी के साथ मैं अपने ब्लॉग का दायरा घोषित करनें की कोशिश करता हूँ। जैसे कि हर चिठ्ठे पे होता है, उसी तरह ये चिठ्ठा मेरे विचारों का प्रतिबिंब बनकर मेरे भावों को शब्दारूप देगा। लेखों का संदर्भ मुख्यतः मेरी निजी जिन्दगी, राजनीती, हिन्दी और अंग्रेजी फिल्में, नई पुरानी खबरें, तथा अन्य ब्लॉग पर चल रही चर्चा के मामले रहेंगे। अपने काम या व्यक्तिगत जीवन की ज्यादा बातें सरे-आम डालना मुनासिब नही समझता, क्योंकि सुना है कि आजकल कंपनियाँ नये लोगो को नौकरी देने से पहले उनके नाम की गूगल पे जाँच-पड़ताल करती है और मैं नही चाहूँगा कि मेरी किसी क्षण के विचार मेरे भविष्य में बाधा पहुँचाने वालों के हाथ हथियार बनें।
Tuesday, November 15, 2005
Bade Bhai Sahab
यह मेरी पहली हिन्दी की पोस्ट है| मैं आपको विकीसॉर्स से परिचय करवाना चाहता हूँ | उसपर प्रेमचंद की अनेक कहानियाँ है जो आप इस कडी पे पढ सकते हैं |
आइये आपके मनोरंजन के लिये प्रेमचंद की बडे भाईसाहब कहानी के चंद परिच्छेद प्रस्तुत करता हूँ | इसमे एक बडा भाई अपने छोटे भाई को समझा रहा है कि उसकी पढाई कितनी कठिन है और इसलिये छोटे को भी अपनी पढाई मे अभी से ही ज्यादा ध्यान देना चाहिये |
"मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्याल में! दरजनो तो जेम्स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्स दिमाग चक्कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।
"और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्या फर्क है और व्यर्थकी बात के लिए क्यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल- रोटी खायी, इसमें क्या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्या फायदा?
"इस रेखा पर वह लम्ब गिरा दो, तो आधार लम्ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्ध लिखो, जो चार पन्नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।
"कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्दी बहुत अच्छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्य में कही जा सके, उसे चार पन्ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्कि उसका दुरूपयोग है कि व्यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्ने भी पूरे फुल्सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्याचार नहीं तो और क्या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्दी पर संक्षेप में एक निबन्ध लिखो, जो चार पन्नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे गिरह बांधिए नही पछताएँगे।"
है ना मजेदार !
Tuesday, October 4, 2005
A Brief History of Nearly Everything
Just finished reading Bill Bryson's wonderful book, A Brief History of Nearly Everything. Experience, in brief, has been humbling.
A Brief History of Nearly Everything tells, well, a brief history of nearly everything. The author explains history of the most of the major sciences such as Physics, Chemistry, Astronomy, Geology, Paleontology, Oceanography, Biology, etc. in a very simple laymen's language since the dawn of the time until now. Journey of universe, earth, humanity and sciences, and discovery of what we know and how did we find them, from the biggest bang to 21st century penned in these 500 pages of gripping and amazing story! An unmatchable read. Truly.
My thoughts before starting the book were that perhaps book will introduce history of earth and life in a matter of fact manner, but Bill has dealt with variety of subjects from perspective of various scientists, researchers, discoverers and inventors making story not only pedantic but also heart touching. And in the end, the vastness of everything, and the significance of whole universe, and utter insignificance of our presence is unnerving. A little disappointing perhaps, for humans have always desired to find the purpose of life, which we are told in no explicit terms, is nothing. Nothing at all. We are here result of fluke of chance, and we will be just one of billions of billions of species in history of everything. We do not matter. Nada. No purpose. Except, perhaps, to propagate.
The book starts with the beginning of time at the Big Bang, and the formation of matter and universe and galaxies and earth. The narrative is not chronological, mostly because explorations in many branches of science move in parallel, but yet coherent and simple enough. Special feature of the narrative is not the order of things as they happened, but as they were discovered to have happened, interspersed with eccentricities of the people and societies then. The author recounts the history of geology and paleontology, biology and life, evolution and expansion of universe, and nearly everything and how it intervenes with everything else. We are led into old times into mind of those great thinkers, the hardships and jubilations they faced, the triumphs and defeats of mankind, and pretty and ugly face of human nature.
We learn that science is immensely difficult job. Much more than one can ever imagine. Much more than I ever though of. Much more than one is led to believe in this day or age. People spend their lifetime, literally, for doing something that will be disputed, ignored or even refuted as soon as they complete. They are hampered by political fallouts of wars and research funding, by fellow zealous scientists, by prevalent social views and stigma, and by their family. Many die unnoticed, unaccounted, ignored and discredited even for their best gift to mankind and sciences. Many rise from utter penury simply by their strong will, many are unimaginably brilliant to have thought of what they did then and many are utterly adventurous hardly caring for their own life in face of their curiosity! All we know is due to hard work of those, many of which we do not know even to thank for, and many we just simply cannot, ever. It would be injustice to pick one out of numerous examples in the book, but for sake of making a point, in one case a researcher spent 20 years calculating tables explaining motion of earth around the sun for occurrences of ice ages, which, by modern computers can be completed in less than 20 minutes.
The author quotes one of the scientists that scientific discoveries follow three-stage process. First, they are denied of being true. Second, they are denied of being important. And third, they are credited to wrong person. A profound and very true statement. After reading, we realize that so much talented minds are lost because of utter carelessness of fellow human beings, that so much advancement has been hampered by religious zealots and dogmatic society, including, fellow scientists.
One the simple yet effective technique adopted by the author to make the readers realize the unimaginable dimensions of the world is to compare it with ordinary matter. By repeated comparison of atoms/bacteria with a cricket ball or universe with United States area, unimaginable vastness of the beyond and meaningless smallness of atomic world dawns on us.
Though opinions of evolution vs. Intelligent Design are aplenty. After reading this book, one can refute ID option by its very postulate. World is utterly complex place, and anything like what we have to happen by itself, perhaps is ridiculously absurd. However, to have like what we have to be designed intentionally by superior being is even more ridiculously absurd. If you trusts the depths of the oceans, expansion of the universe, black matter, innumerable bacterial life which is omnipresent and omnipotent (at least, when combined), and utter meaningless (to us, and in fact to everything) and complexity of everything (for example, quarks, or DNA), then one can only question the intelligence of the designing entity. I am sure you would agree, that is if you are proponents of ID "theory", that world could have been designed trillionth time simpler than what it is now, and it would make sense to do so, if you were to contemplate designing something of similar nature now. One may argue that humans cannot fathom the depths and intentions of the God, yet still, even when I am staunch theist, I would have to question the sanity and intelligence of the God, if He/She indeed did design something like this.
All in all, an wonderful read which raises millions of unsolved problems, for answers to which we have to wait for science to progress sufficiently forward, which, unfortunately, may not happen within our lifetime. After all, when history of everything, and progress of science from 1600 AD until now is compressed into a 500 page book and read within less than a day, brain is overwhelmed by the amount of information and eagerly seeks answer to unfinished queries, which, alas, will not be answered in next 50 pages, as it has been so far.
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