Saturday, August 12, 2006

कोमा जो मात दे गया

लिखने में वर्तनी और व्याकरण की गलतियों से शायद ही कोई बचा हो, किंतु हम में से किसी नें इनके लिये परीक्षा में २-४ अंको के अलावा ज्यादा नही खोया है। कनाडा की एक कंपनी रोज़र्स कम्मुनिकेशन (Rogers Communications) इतनी भाग्यशाली नही थी, जिसने एक कोमा की गलती की सजा २१.३ लाख डॉलर देकर चुकाई!



हुआ यूँ कि रोज़र्स नें एलिऐंट (Aliant) से एक सेवा का पंच-वर्षीय समझौता किया २००२ में - एलिऐंट को रोज़र्स के संचार तारों को सारे खंबों से बाँधना था और उनकी मरम्मत करनी थी $९.६० प्रति खंबे की दर से। समझौते की शर्तो के अनुसार समझौता पाँच साल तक लागू रहेगा, और उसके बाद अगले पाँच साल के लिये बढ़ाया जा सकता है जबकि दोनो में से कोई भी कंपनी एक वर्षीय सूचना देकर समझौता नही तोड़ती है। सीधी सी बात, नही? पर इस वाक्य को समझौते के लेखाकारों ने ऐसे लिखा:


The agreement “shall continue in force for a period of five years from the date it is made, and thereafter for successive five year terms, unless and until terminated by one year prior notice in writing by either party.”



और यहीं रोज़र्स मात खा गया। दूसरे कोमा को (unless के पहले) देखिये। इसकी अनुपस्थिती में समझौता रद्द करना २००७ के बाद ही संभव था; इसकी उपस्थिती में पहलें पाँच सालों में भी एक-वर्षीय सूचना के साथ रद्द करना जायज़ है। एलिऐंट के तेज वकीलों ने इस पंक्ति को पकड़ा और साल भर पहले सेवा देना बंद करने की सूचना दे दी। और काम की कीमते बढ़ा दी। बेचारे रोज़र्स के वकील खिसिया रहे हैं। ये तो फिर भी एक उद्यम को हुआ जिसके लिये २१ लाख शायद ज्यादा मायने नही रखता पर फिर भी...अब व्याकरण को नई दृष्टि से देख रहा हूँ!



कड़ी साभार, पूर्ण समाचर

http://www.futilitycloset.com/2015/07/08/law-and-punctuation/

Friday, August 11, 2006

गर्भावस्था - सवाल और जवाब

प्र: क्या मैं पैंतीस के बाद बच्चे पैदा कर सकती हूँ?
उ: नही, पैंतीस बच्चे बहुत हैं।

प्र: गर्भावस्था में सबसे ज्यादा किस चीज की इच्छा होती है?
उ: कि काश औरतों की बजाय आदमी गर्भवती होते।

प्र: बच्चे के लिंग जानने के लिये सबसे अच्छा तरीका क्या है?
उ: बच्चे का जन्म।

प्र: जैसे-जैसे मेरी गर्भावस्था बढ़ती है, ज्यादा-ज्यादा अनजाने लोग मुझे देखकर मुस्कुराते हैं। क्यों?
उ: क्योंकि आप उनसे भी ज्यादा मोटी हैं।

प्र: मेरी पत्‍नी पाँच महीने से गर्भवती है, और इतनी मूडी (moody) है कि कभी वो पागल तक हो जाती है।
उ: तो प्रश्‍न क्या है?

प्र: मेरे बच्चों के डॉक्टर ने बताया कि जन्म के दौरान मैं दर्द नही दबाव महसूस करती हूँ। क्या वो सही है?
उ: हाँ, उसी तरह जिस तरह तूफान को हवा का झौंका भी कहा जा सकता है।

प्र: क्या ऐसी कोई चीज है जिससे मुझे बचना चाहिये बच्चे के जन्म के बाद?
उ: हाँ, दूसरी गर्भावस्था।

प्र: हमारा बच्चा पिछले सप्ताह पैदा हुआ। मेरी पत्‍नी कब सामान्य महसूस होना और बर्ताव करना शुरू कर देगी?
उ: जब बच्चें कॉलेज में जा चुके हों।

Thursday, August 10, 2006

चित्रों में यूनिवर्सल स्टूडियो हॉलीवुड

entrance

कुछ सप्ताह पहले मैं (दायाँ) और मेरे मित्र अंकुश (मध्य) और रवि (बायाँ) लॉस-एन्जेल्स (Los Angeles) स्थित यूनिवर्सल स्टूडियो (Universal Studio Hollywood) गये थे। अमेरिका के प्रसिद्ध चलचित्र निर्माण उद्यम यूनिवर्सल स्टूडियो की फिल्मों के आधार पर बना यह पार्क कई खेल-खिलोने समेटे हुये है। साथ ही कई असली के सेट और सामाग्री भी हैं जिन्हें कई प्रसिद्ध फिल्मों में उपयोग किया गया है। ऊपर के चित्र में हम मुख्य द्वार पर बैठे हैं और हर देसी की तरह एक "गया था-देखा था" (been there, done that) वाला चित्र खिंचवा लिया! फिर हम "जुरासिक पार्क" के सेट के आधार पर बनी नौका यात्रा पर गये।

jurassic park

अगले चित्र में हम छलांग लगाने वाली नाव की यात्रा के बाद बाहर खड़े हैं।

boat jump

"ममी" फिल्म के आधार पर एक रॉलर-कॉस्टर झूला भी बड़ा मजेदार था हांलाकि सिक्स-फ़्लैग्स (Six Flags) जैसे पार्कों के मुकाबले बहुत ही कम रोंमांचक था।

mummy ride

रास्तें मे डॉनाल्ड-डक, मिकी माऊस और भी पता नही कौन-कौन से चरित्र ऊटपटांग नाच रहे थे - और आश्चर्य की बात कि छोटे बच्चें इनके भी हस्ताक्षर ले रहे थे!

donald duck

सब खेल निपटाकर यूनिवर्सल के पुराने सेटों पर गयें। नीचे दिये चित्र को ध्यान से देखिये - क्या कमाल की चीज है। मेरा चित्र पृष्ठभूमि से थोड़ा बड़ा है वरना इसको देखकर लगता नही कि ये बहुत छोटा सांचा है जिसे फिल्मों में दूर से दिखता जहाज बना दिया जाता है।

fake facade

पूरा का पूरा शहर बनाया हुआ है कई जगह बिना ईंट और सींमेंट के सिर्फ फ़ॉम से बिलकुल असली दिखने वाला। अगले चित्र में भी पृष्ठभूमी केवल एक बड़ा सा बॉर्ड है जो कि एक नजर में असली की पहाड़ी दिखती है (हांलाकि ये सेट का हिस्सा नही)।

hollywood sign

अंत मे चलते-चलते शाम की रंगीनी को कैमरे में कैद करता ये ग्लोब:

hollywood ball

अरे हाँ, रास्ते में ये डरावने वाले भाईसाहब भी मिले थे तो हमने सोचा इनको भी जरा निबटा ही देते है!

kick it


इस यात्रा के समस्त चित्र देखनें के लिये यहाँ क्लिक करें और मेरे अन्य चित्र देखने के लिये यहाँ पधारें

Wednesday, August 9, 2006

धागों का त्योहार

रक्षाबंधन के इस पावन पर्व पर सभी को बधाई एवं शुभकामनाऐं। व्यस्तता और पाश्चात्यीकरण की और अग्रसर हमारे इस समाज में जहाँ दीवाली के पटाखों की गूँज हल्की होती जा रही है, होली के रंग फ़ीके पड़ते जा रहें, एवं वैलेंटाईन डे करवाचौथ को पीछे धकेल रहा है, मेरी ये मनोकामना है कि राखी का सरल किंतु अपने रूप मे दुनिया में शायद अनोठा यह पवित्र त्योहार हमारे हृदय से ना रूठे।

इसी के साथ सुनिये रागा पर ये गीत और अपने भाई/बहन को याद कर लीजीये...

चित्र साभार: सर्च डॉट कॉम

Saturday, August 5, 2006

स्वर्ग या नर्क?

स्वर्ग वहाँ है जहाँ है आपके पास:

* अमेरिकन आमदनी
* ब्रितानी घर
* चीनी व्यंजन
* स्विट्जर्लेंड की अर्थव्यवस्था
* ईतालवी सेहत/शरीर
* जापानी तकनीकी
* अफ्रीकी औजार
* भारतीय पत्‍नी

नर्क वहाँ है जहाँ है आपके पास:

* अमेरिकन पत्‍नी
* ब्रितानी सेहत/शरीर
* चीनी औजार
* स्विट्जर्लेंड के व्यंजन
* ईतालवी तकनीकी
* जापानी घर
* अफ्रीकी अर्थव्यवस्था
* भारतीय आमदनी

Thursday, August 3, 2006

ठहाको का खज़ाना

पिछली प्रविष्टी के संदर्भ में मेरा अफ़वाह निर्देशिका (Urban Legend Reference Pages) पर जाना हुया। निर्देशिका लगभग सभी ई-मेल अग्रस्थ सच और झूठी खबरों और अफ़वाहों की सूची है, और उनके जन्म के बारे में यथासंभव जानकारी रखती है। ये समझ लीजीये कि ठहाकों का खज़ाना मिल गया। क्या-क्या लोग बनाते है कल्पना भी नही की जा सकती! उदाहरण के तौर पर देखिये अमेरिका में बच्चों के लिये सरकारी सहायता हेतु निवेदन पत्र की पंक्तियाँ, गरीबों द्वारा सरकारी सहायता हेतु निवेदन, महिला मित्र के तोहफा में अदला-बदली का असर, बोर होने पर सुपरस्टोर में मस्ती करने के नुस्खे, और भी बहुत कुछ! पढ़िये और कई दिनों तक मुस्कुराईये!

साथ ही कुछेक रोचक जानकारी भी है: माईक्रोवेव में पानी उबालने से मुसीबत, चीन की दीवार चाँद से नही दिखती, डाईहाईड्रोज़न-मोनोऑक्साईड के नुकसान, किस्मत का कमाल और बड़प्पन की मिसाल!

******

अन्य खबरों मे: टाईम्स के अनुसार नये अनुसंधानों द्वारा ये सिद्ध किया गया है कि सुंदर जोड़ों को लड़कियाँ होने की संभावना २५‍% तक अधिक होती है क्योंकि जीवों के विकास के दौरान सुंदरता स्त्री के लिये अच्छा वर ढूँढ़ने में सहायक रही है जबकि पुरूष को सुंदरता से कोई विशेष फायदा नही होता। अतः संबंधित जीनों का मानव में आधिपत्य हो गया है। (कड़ी साभार)

Tuesday, August 1, 2006

साबुन चाहिये श्रीमान?

चेतावनी: ऐसी जगह ना पढ़े जहाँ दिल खोलकर हँस ना सके!

आरोन्स-जोक्स से अनुवाद किया गया चुटकुला जहाँ यह शैली बर्मन (Shelly Berman) द्वारा लिखित "होटल एक मजेदार जगह" (A Hotel Is A Funny Place) से लिया गया:

------------------------------------------
प्रिय सेविका,

कृपया इन छोटे साबुनों की बट्टियों को मेरे स्नानागार में ना छोड़े क्योंकि मैं स्वयं का बड़ा सा साबुन लाया हूँ। कृपया दवाओं की अलमारी से नीचे की अलमारी में रखी छः और स्नानागार की साबुनदानी में रखी तीन बिना खुली बट्टियाँ हटा लें, वे मेरें काम करने के रास्ते में आ रहीं हैं।

धन्यवाद,
शैली बर्मन
------------------------------------------
प्रिय कमरा क्रमांक ६३५,

मैं आपकी रोजमर्रा की सेविका नही हूँ, वह तो अपनी छुट्टी के बाद से कल आयेगी। जैसा आपने कहा वैसे मैने तीन साबुन की बट्टियाँ साबुनदानी से हटा दी हैं। अलमारी में रखी हुई छ: बट्टियाँ मैने आपके रास्ते से हटाकर क्लीनेक्स के डब्बे के ऊपर रख दी गई है अगर आपके विचार बदलें तो। इसके बाद मैने जैसा कि मुझे प्रबंधन से निर्देश है उसके अनुसार तीन बट्टियाँ स्नानागार में रख दी गई हैं। आशा करती हूँ कि आप संतुष्ट होगें।

कैथी, अस्थाई सेविका
------------------------------------------
प्रिय सेविका - मैं आशा करता हूँ कि तुम मेरी नियत सेविका हो

लगता है कैथी ने तुम्हें साबुन की बट्टियों के बारे में मेरे पत्राचार के बारे में नहीं बताया। जब मैं आज शाम अपने कमरे पर लौटा तो पाया कि तुमने ३ कैमे मेरी दवाओं की अलमारी के नीचे वाली अलमारी में रख दिये हैं। मैं इस होटल में दो सप्ताह रुकने वाला हूँ और इसीलिये खुद का बड़ा सा साबुन भी लाया हूँ, अतः मुझे ये छः कैमे की बट्टियाँ नही चाहिये जो अलमारी में हैं। वे मेरे दाढ़ी बनाने और मंजन करने के रास्ते में पड़ती हैं, कृपया उनहे हटा लें।

शैली बर्मन
------------------------------------------
श्रीमान बर्मन जी,

सहायक प्रबंधक श्री केंसेडर ने मुझे सूचित किया कि आपने उनहें कल शाम को फोन करके बताया कि आप अपने कमरें में सेविका की सेवा से संतुष्ट नही हैं। अतः मैने एक नई लड़की आपके कमरे के लिये निर्युक्त की है। मेरी आशा है कि आप पिछली परेशानी को क्षमा कर देंगें। अगर और की समस्या होतो मुझे प्रातः ८ से सायं ५ तक ११०८ पर संपर्क करें।

धन्यवाद
ईलेन कार्मेन
सेवा प्रबंधक
------------------------------------------
प्रिय कार्मेन

आपको फोन से संपर्क करना मेरे लिये असंभव है क्योंकि मैं काम की वजह से होटल से प्रातः ७:४५ बजे निकल जाता हूँ और सायं ५:३० या ६:०० से पहले नही लौट पाता। इसी कारण मैनें श्री केंसेडर को फोन किया था। आप पहले ही घर जा चुकी थी। मैने श्री केंसेडर से सिर्फ यही पूछा था कि वो इन साबुन की बट्टियों के बारें में कुछ कर सकते हैं क्या? आपने जो नई सेविका भेजी है उसने सोचा होगा कि मैं आज ही होटल में नया आया हूँ क्योंकि वो स्नानागार में तीन साबुन के अलावा मेरी दवा की अलमारी में भी तीन बट्टियाँ रख गई है। केवल ५ दिनों में मैने साबुन की २४ छोटी बट्टियाँ इकठ्ठी कर ली हैं। आप मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही है?

शैली बर्मन
------------------------------------------
श्रीमान बर्मन जी,

आपकी सेविका कैथी को यह निर्देश दे दिया गया है कि वो आपके कमरें में साबुन पहुँचाना बंद कर दे और अतिरिक्त साबुन को हटा दे। अगर और की समस्या होतो मुझे प्रातः ८ से सायं ५ तक ११०८ पर संपर्क करें।

धन्यवाद
ईलेन कार्मेन
सेवा प्रबंधक
------------------------------------------
श्री केंसेडर जी,

मेरा बड़ा वाला साबुन मिल नही रहा है। मेरे कमरे से साबुन की हर एक बट्टी हटा ली गई है, मेरे खुद के बड़े साबुन की भी। कल रात जब मैं आया तो मुझे चौकीदार को बुलाकर ४ छोटे काशमीरी बुके साबुन मगाँना पड़ा।

शैली बर्मन
------------------------------------------
श्री बर्मन जी,

मैने होटल की सेवा प्रबंधक ईलेन कार्मेन को आपकी साबुन की समस्या से अवगत करा दिया है। मुझे ये समझ में नही आता कि आपके कमरें में साबुन कैसे नही था क्योंकि हमारी सेविकाओं को रोज तीन बट्टियाँ छोड़ने का निर्देश है। आपकी स्थिती का जल्दी ही समाधान किया जायेगा। परेशानी के लिये मुझे क्षमा करें।

मार्टिन केंसेडर
सहायक प्रबंधक
------------------------------------------
प्रिय कार्मेन जी,

किस गधे ने मेरे कमरे में कैमे की ५४ छोती टिकियाऐं रखी? कल रात जो मैं जब आया तो ५४ साबुन की बट्टियाँ पाई। मुझे ५४ बट्टियाँ नही चाहिये। मुझे सिर्फ मेरा बड़ा वाला साबुन चाहिये। क्या आपको अहसास है कि मेरे पास ५४ साबुन की बट्टियाँ है? मुझे केवल मेरा वाला साबुन चाहिये। कृपया मेरा वाला साबुन दें दे।

शैली बर्मन
------------------------------------------
श्रीमान बर्मन,

पहले आपने अपने कमरे में बहुत ज्यादा साबुन की शिकायत की तो मैने उनहे हटवा दिया। फिर आपने श्री केंसेडर से शिकायत की आपके पास साबुन नही तो मैने खुद उन्हे लौटा दिया - २४ कैमे जो पहले हटाया था और तीन बट्टियाँ जो आपको रोज मिलनी चाहिये थी। मुझे ४ काशमीरी बुके के बारे में कुछ नही पता। निश्चित ही सेविका कैथी को ये पता नही था कि मैं आपके साबुन लौटा आई हूँ, अतः वह भी २४ कैमे और तीन रोज के हिस्से के साबुन रखा आई। मुझे ये पता नही कि आपको ये खयाल कहाँ से आ गया कि इस होटल में बड़ा वाला साबुन दिया जाता है। मुझे एक दूसरा बड़ा साबुन मिला जो मैं आपके कमरें में रख आई हूँ।

ईलेन कार्मेन
सेवा प्रबंधक
------------------------------------------
प्रिय कार्मेन जी,

मैने सोचा कि आपको मैं अपने साबुनों के खजाने के बारे में नई जानकारी दे दूँ। आज के दिन मिला कर मेरे पास है:

  • दवाईयों की अलमारी के नीचे वाली अलमारी में - ४ की ४ गड्डीयों और २ की १ गड्डी मे १८ कैमे
  • क्लीनेक्स के डब्बे पर - ४ की २ गड्डीयों और ३ की १ गड्डी मे ११ कैमे
  • शयनकक्ष के बगल में - ३ काशमीरी बुके १ गड्डी में, ४ होटल द्वारा दिये गये बड़े साबुन की १ गड्डी, और ४ की २ गड्डियों मे ८ कैमें
  • दवाई वाली अलमारी में - ४ की ३ गड्डियों मे और २ की १ गड्डी में १४ कैमे
  • स्नानागार की साबुनदानी में - ६ कैमे, बहुत गीले
  • टब के उत्तर-पूर्वी कोने पर - १ काशमीरी बुके, थोड़ा इस्तेमाल किया गया
  • टब के उत्तर-पश्चिमी कोने पर - ३ की २ गड्डियों में छ कैमे
कृपया कैथी से कहियेगा कि जब वो सफाई करे तो ध्यान रखे कि गड्डियाँ साफ-सुथरी हैं और जमीं हैं। उसे यह भी सलाह दीजीयेगा कि ४ से बड़ी गड्डियों की गिरने की संभावना होती है। क्या मैं आपको सलाह दे सकता हूँ कि मेरे शयनकक्ष की खिड़की की पट्टी की जगह अभी खाली है और भविष्य की साबुन रखने की अच्छी जगह साबित होगी। एक और बात, मैने अपने लिये एक और बड़ा वाल साबुन खरीद लिया है जिसे कि मैं होटल के लॉकर में रख रहा हूँ जिससे की आगे से कोई गलतफहमीं ना हो।

शैली बर्मन
------------------------------------------

इस पन्ने के अनुसार यह एक सच घटना नही है बल्कि बनाई हुई है। हाँलाकि इससे चुटकुले का मजा कम नही हो जाता!

Monday, July 31, 2006

सहनशीलों की असहनशीलता

आजकल पॉलिटिकल-करेक्टनेस (political correctness) का जमाना है। और जो मुझे जानते है वो ये भी जानते हैं कि मुझे यह शब्द और यह विचार हमारी सामन्य दिनचर्या में थोपा गया थोथलापन प्रतीत होता है। राजनेताओं से आपेक्षित यह बात आजकल हर किसी पर लागू होती है। मुझे सच को बिना घुमा-फिराकर कहने की आदत है। मुझे ये भी पता है कि सबके अनुसार सच अलग-अलग होते है, और मैं सबकी अपने अनुसार बिना गलत समझे जाने के डर के सच कहने की स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूँ। पर जैसा सभी जानते है, आजकल वैसा संभव नही। आपको अपनी बातों में कईयों 'लेकिन-परंतु' लगाने पड़ते है और हर बात में ये ध्यान रखना पड़ता है कि ना जाने कोन से विचारावलंबियों को या समुदाय को आप नाराज़ ना कर दें। डर-डर के एक-एक शब्द बोलना या लिखना पड़ता है वरना सभी के प्रति सहनशीलता के ठेकेदार आपकी भावानाओं को किसी-ना-किसी के विरोधी करार देगें और आपको असहनशील घोषित कर देगें, भले ही आपने उस बारें में सोचा तक नही हो।

पिछले कुछ दिनों में मैं रिमी सेन के अफ़्रीकनों की सुंदरता पर दिये बयान और कभी अलविदा ना कहना में दर्शाई बेवफ़ाई पर हुई बहस का हिस्सा बना, और एक बात मैने देखी कि असहनशीलता अब नया रूप लेके प्रकट हो रही है। इस नए रूप के अनुसार आपको हर किसी के विचारों से सहमत होना पड़ेगा और पॉलिटिकली-करेक्ट विचार रखने पड़ेंगे। इन विचारों के लोग बहुत सहनशील होते है और जो व्यक्ति इनकी नज़रो में सहनशील नही होता वो व्यक्ति इन लोगों को सहन नही होता। विचारों की भिन्नता को स्वीकारना भूलकर हम सारी दुनिया को एक जैसा बना देना चाहते है - वैसा जिसमें कोई किसी बात पर प्रश्न ना उठा सके और किसी विचार से हटकर सोच ना सके। साथ ही मुझे डर है कि हम किसी बात को हल्का लेकर मज़ाक में उड़ाना भूलते जा रहें है। हम सहनशीलों की असहनशील भीड़ में बदलते जा रहें हैं।

इसी विषय पर एक और रुचिकर बात ये प्रतीत होती है कि हमारे समाज़ के पैमाने के अनुसार कुछ विचार या समूह किसी अन्य विचार या समूह से ज्यादा नाज़ुक होते है और आपकी सहनशीलता सिर्फ पहले समूह के लिये आकांक्षित है, दूसरे के लिये नही। स्त्री-पुरूष के बारे में कुछ बोलो तो लैगिंकवादी (sexism) पर बच्चे-बूढ़े के बारे में बोलो तो "उम्रवादी" (ageism) क्यों नही? काले-सफेद के बारे मे बोलो तो रंगभेद (racism) पर मोटे-पतले के बारे में बोलो तो "वज़नभेद" ("weightism") क्यों नही? हिन्दु-मुसलमान के बारे में बोलो तो धर्म के अनुसार भेद पर राजनेता या व्यापारी को गाली दो तो उद्यम के अनुसार भेद क्यों नही? मैं जरूरी नही इनमे से किसी भी बात का समर्थन करता हूँ, पर मुझे यह रुचिकर लगता है कि किस तरह एक समूह के लोगों का नाराज़ होना समाज को मंज़ूर है - बल्कि अपेक्षित है - और दूसरे समूह के लोगो का नाराज़ होना मंज़ूर नही, और किस तरह इतिहास इन विचारों के विकसित होने में भागी है।

इस प्रविष्टि की उपस्थिती से आप कुछ विषयों में मेरे पक्ष का अंदाजा लगा सकते हैं - और चूँकि ये पॉलिटिकल-करेक्टनेस का जमाना है - मुझे ये बताना जरूरी है कि किसी भी विचार को अनेक पहलुओं से देखने की मेरी आदत है और जरूरी नहीं कि मैं उनसे सहमत होऊँ, पर उन पहलुओं की उपस्तिथी ही उस विचार को रुचिकर बनाती है।

Sunday, July 30, 2006

इंटरनेट पर जाओ - मच्छर भगाओ

संगणक (computer) और अंतर्जाल ने दुनिया कैसी बदल दी है वह किसी से छुपा नही है। चूहे के द्वारा स्पर्श से शुरू अंतर्जाल ध्वनि और चलचित्रों के माध्यम से हमारी आँखों के साथ-साथ हमारे कानों पर भी छा रहा है। नये अनुसंधानों के अनुसार वह दिन भी दूर नही जब हम गंध भी अंतर्जाल पर बाँट सकेंगे। जालस्थल के द्वारा भेजे गये विशिष्ट संदेशों को आपके संगणक से जुड़ा यंत्र अपने अंदर स्थित दो-तीन गंधो को मिलाकर नई गंध बना देगा (जैसे कि अभी रंग बनते हैं)। अभी-अभी प्राप्त सूचना से ये ज्ञात हुआ है कि कोरिया स्थित एम्पास कंपनी ने ऐसा निःशुल्क टूलबार बनाया है जिसके इंस्टाल करने से मच्छर भाग जाते हैं। कंपनी के अनुसार ये टूलबार संगणक से ऐसी ध्वनी उत्‍पन्न करवाता है जिसे सिर्फ मच्छर ही सुन सकें और आसपास से भाग जायें। जिन वस्तुओं का संगणक/अंतर्जाल से कुछ लेना-देना नही वहाँ भी इनकी उपयोगिता आश्चर्यचकित करने वाली है। आने वाले समय में विज्ञान-कल्प की कथाऐं असंभव नही लगती!

साथ ही: चिठ्ठे दक्षता से पढ़ना
यदि आप कई चिठ्ठे पढ़ते हैं और उनमें कोई नई प्रविष्टि आई या नही की जाँच करने चिठ्ठों पर जाते हैं, तो चिठ्ठों के फ़ीड पाठकों की मदद से काम बहुत ही आसान हो जाता है। नई खबर के लिये नारद जी के दरवाजे भी जाने की जरूरत नही, और तो और, आप प्रविष्टियाँ भी बिना चिठ्ठे पर जायें पढ़ सकते हैं। ब्लॉगलाईन्स (bloglines) नामक फ़ीड पाठक सरल और उपयोगी है। यही नही समस्त समाचारों की ताजा जानकारी इससे जुटाई जा सकती है। जो लोग इसके बारें में नही जानते हों वे आज ही जानकारी प्राप्त करें और अंतर्जाल(धन्यवाद आलोक जी) जाल २.० की क्रांति मे शामिल होवें! ऐक बार फायदे जान जायेंगे तो फिर ना नही कर पायेंगे!

उपलेख (जुलाई २९): आप मच्छर का टूलबार यहाँ से डाऊनलोड कर सकरे हैं। एम्पास के जालपृष्ठ को पढ़ने के लिये गूगल अनुवादक का उपयोग करें, हांलाकि सफलता ज्यादा नही मिलेगी। टूलबार का इंस्टालेशन भी कोरियन भाषा में है!

Saturday, July 29, 2006

तर्क-वितर्क, उम्र-परिपक्वता

अभी मेरी उम्र ज्यादा नही है। (महा)विद्यालय परिसर के बाहर कदम रखे हुये गिनती के दिन हुऐ हैं। फिर भी पिछले दो-चार वर्षों मे कितना कुछ पढ़ने से (मुख्यतर चिठ्ठों पर) और बहुरूचि लोगों के संपर्क मे आने पर पर ऐसा महसूस होता कि सोच में बहुत गहरा परिवर्तन आया है। लोग कहतें है कि पच्चीस वर्ष की आयु तक इंसान की सोच पत्थर की लकीर की तरह कठोर हो जाती है और वह बाकी की सारी जिंदगी उनही विचारों के दायरे मे बिना किसी खास परिवर्तन के जीता है। शायद मेरी उम्र का भी ये पढ़ाव अंत की और है।

पिछलों चार सालों के अंदर, जबसे मैनें राजनिती और अपने आसपास की दुनिया में रूचि लेनी शुरू की, मैंने ना जाने कितनी बार अपने विचार पैने किये, बदलें और नये विचार अपनाये। अगणित बहसों में हिस्सा लिया। अगर ये कहूँ कि लगभग बहस के हर संभव विषय - जिनमें मेरी रूचि और जानकारी है - पर मैं भाग ले चुका हूँ और मेरी राय बन चुकी है तो अतिश्योक्ति नही होगी। लिनक्स-विंडोज़, आरक्षण, नारी अधिकार, समलिंगी लोग, भारत-पाकिस्तान, महात्मा गाँधी, चुनाव, लोकतंत्र, बलात्कार की सजा, पूँजीवाद-समाजवाद-साम्यवाद, आस्तिकता-नास्तिकता, हिन्दु-मुस्लिम, ईसाई धर्म परिवर्तन, ईराक, इतिहास की सच्चाई, आदि...के विषयों पर तार्किक विवाद, कटाक्ष और खौलती गाल-गलोच समस्त का उपयोग कर या देख चुका हूँ। लेकिन आज तक, बिना अपवाद, मुझे एक भी एसा मनुष्य नही मिला जिसके विचार पूरे विवाद के तर्को के आधार पर अपनी शुरूआती स्थिती से क्षणिक भी भटके हों। मेरे तर्क किसी की राय में तिलमात्र परिवर्तन नही कर पाये। ना ही उनकी राय का मेरे विश्व-वृत्त पर असर हुआ।

ऐसा नही है कि मैं बिल्कुल ही हठधर्मी हूँ। अपने अनुसार मैं सदा ही खुले विचारों का इंसान हूँ - जैसे कि हर इंसान होता है। परंतु अधिकतर बहसों में मेरा पक्ष मुझे बेहतर लगता है - दूसरे पक्षों के गुणों को लेकर भी। ऐसा भी नही कि मेरे विचारों में परिवर्तन नही आया। अमित वर्मा के चिठ्ठे से मेरा झुकाव पूँजिवाद की और बढा है, शांत चीख (blank noise) ने स्त्री उत्पीड़न के बारे में संवेदना जगाई है, और एलन और बारबरा पीज़ की पुस्तक "आदमी क्यों नही सुनते और औरतें नक्शा क्यों नहीं पढ़ सकती" ने समलैगिकों के प्रति मेरी राय में काफ़ी अंतर डाला है। परंतु ये भी तब ही कि शुरू से ही मेरी विचार इन विषयों मे कच्चे थे, या ये कहें मैं कट्टर नही था, इसीलिये जो मिला उसी की और बिना प्रतिरोध झुक गया। किंतु जिन बिंदुओं पर मेरे विचार लगभग पक्के हो चुकें है, मुझे नही लगता वे कभी बदलेंगे। ये कथन मेरे चरमपंथी की और इशारा कर सकता है पर मेरा अनुभव कहता है कि सभी के साथ ये होता है। और फिर जब सभी अपनी राय को बेहतर मानते हैं तो इस दृष्टि से सभी चरमपंथी हुये ना?

परिचर्चा पर भी कुछ-एक विषयों पर बहस भी मेरी राय को और मजबूत बनाती है। यहाँ तक की मेरा ये विश्वास हो गया है कि तर्कों से किसी के भी विचार, जो एक बार विचार बना लेता है, परिवर्तित ही नही किये जा सकते। और तर्क-वितर्क मुझे अब सिर्फ बैठे-बिठाये का मनोरंजन या भावनाओं का विस्फोट प्रतीत होता है, ना कि अपने विचारों का आदान-प्रदान कर समस्या के हल की और पहुँचने का साधन। मेरे अनुसार कोई भी बहस अपने-अपने पक्षों की घोषणा बे बाद समाप्त हो जानी चाहिये, क्योंकि विपरीत पक्ष को अपने पक्ष मे लाने के समस्त प्रयास सदा ही व्यर्थ हैं। मुझे ये नही पता कि इस बात का अनुभव इतनी बड़ी बात होनी चाहिये या नहीं, लेकिन मेरे लिये तो यह मानव मनोवृत्ति की अनापेक्षित खोज थी। यह भी नही जानता कि इस बात की जानकारी मेरे जीवनदर्शन के लिये लाभदायक है या हानिकारक।

एक और बात जो मुझे अब समझ मे आई वो ये कि कोई कितना भी बड़ा आदमी हो (औहदे, शौहरत या दौलत में) उसकी कही हर बात को मूल्य नही दिया जा सकता। निश्चित ही ये वाक्य किसी को शायद जाहिर प्रतीत होता हो, मेरे जीवन-दर्शन में, जहाँ मैं अपने अध्यापकों और महापुरूषों के विचारों को बिना प्रश्न मूलमंत्र मानता था, एक झटकेदार अंतर है। इतिहास को जो मैं सत्य मानता था उसमें भी कितने प्रश्नचिन्ह लगे हैं ये जाना। यहाँ तक कि हम विश्वास के साथ ये भी नही कह सकते ही महात्मा गाँधी के अंतिम शब्द 'हे राम!' थे - इसमें भी राजनीतिक चालों की धोखेबाज़ी का आरोप है। और फिर सभी महापुरूषों के विचारों मे इतनी विभिन्नता देखी-पढ़ी है कि सच और झूठ भी आपस मे घुल-मिल गया है। जिंदगी काली-सफेद वाली सरलता से इतने रंगों में रंग कर भ्रामक हो गई है।

शायद जीवन के इन मूल्यों को समझना ही परिपक्वता है। मेरी माँ कहती है कि मैं पागल हो गया हूँ/होने वाला हूँ क्योंकि मैं अभी से ही बहुत ज्यादा सोचने लग गया हूँ।

Indian Passport Renewal from USA - A Step by Step Guide [Feb-2026]

This post is intended as working guide for renewing Indian Passport while you are overseas. I had relied extensively on NRI sub-reddit , bes...