अर्थशास्त्र की प्रमेयों और सिद्धांतों में अर्थव्यवस्था के खेल में लगे प्रत्येक खिलाड़ी - चाहे वह आम आदमी, संस्था, व्यापार संगठन अथवा सरकार हो - को तर्कसंगत (rational) अस्तित्व माना जाता है। इसके अनुसार कोई भी सत्ता अपने किसी भी निर्णय को अपने सम्मुख उपलब्ध समस्त विकल्पों के बारें में समस्त जानकारी के साथ पूर्णतः अपने स्वार्थ से ही लेगी। इस पूर्वानुमान में व्यक्ति की भावनावों को भी एक भार दिया जा सकता है और निःस्वार्थ कार्य करने के सुख को स्वार्थ की खुशी के लिये किया गया कार्य माना जा सकता है। अंततः किसी भी व्यक्ति के किसी भी निर्णय को उसके द्वारा सभी उपलब्ध विकल्पों की सीमा में अपनी उपयोगिता सर्वाधिक करने के प्रयास का हल माना जा सकता है। और अगर हम जरा गौर फरमायें तो ये कथन लगभग सर्वदा सत्य ही प्रतीत होता है।
लेकिन हमारे दिन-प्रतिदिन की कुछ घटनायें हमें मनुष्य की तर्करहित मानसिकता से सामना कराती हैं। कई शोधों द्वारा यह सिद्ध हुआ किया गया है कि अभी १०० रूपये लेने और एक साल बाद ५०० रूपयें लेने के विकल्प प्रस्तुत करने पर असंगत संख्या मे लोग पहला वाला, यद्यपि तर्करहित, विकल्प चुनते हैं। इसका कारण यह है कि इंसान की भावनायें और मनोविज्ञान को अभी तक ढंग से समझा नही गया है। और इस स्थिती में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं जो सामान्य समझ से बाहर होती हैं और गणित चरमरा जाता है, क्योंकि फिर ऐसी अवस्था में भविष्य में व्यवहार का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।
उदाहरणतः एक प्रसिद्ध समुद्री डाकुयों की लूट की समस्या (pirates' problem) ही लीजिये। मानें कि ५ बहुत खूनी, लालची, बेदर्दी, तर्कसंगत और लोकतांत्रिक डाकुओं के पास सोने की १०० मोहरें हैं जिन्हें आपस में बाँटना है। डाकू आपस में सब बराबर हैं सिवाय इसके की उनमे कैसे भी एक श्रेष्ठता क्रम है - मान लीजिये की उम्र के अनुसार। लूट बाँटने का सीधा तरीका है - सबसे ज्येष्ठ डाकू एक बँटवारा प्रस्तावित करेगा और सारे डाकू उसके पक्ष और विपक्ष में वोट देंगे। अगर आधा या आधे से ज्यादा वोट मिलते हैं तो बँटवारा मंजूर होगा अन्यथा ज्येष्ठ डाकू को मार दिया जायेगा और बाकियों में से ज्येष्ठ पुनः इसी क्रिया को दोहरायेगा। निश्चित ही कोई मरना नही चाहता और सर्वाधिक धन पाना चाहता है। आप चाहें तो इस जगह रुक कर हल सोचने का प्रयत्न कर सकते हैं।
हल के लिये हमें यह ध्यान देना है कि एक डाकू मरते ही यह N डाकुओं की बजाय N-1 डाकुओं की समस्या बन जाती है। इसके हल को भी उलटा चालू करते हैं २ से और फिर ५ तक पहुँचते हैं। तो २ डाकुओं में श्रेष्ठ डाकू सारी अशर्फियाँ स्वयं को प्रस्तावित कर सकता है और खुद के वोट से प्रस्ताव मंजूर भी करा सकता है और दूसरे को कुछ भी नही मिलेगा। ३ डाकुओं के होने पर श्रेष्ठतम को सिर्फ निम्नतम डाकू को एक अशर्फी का लालच देना है और खुद के लिये ९९ रख सकता है। फिर खुद के और निम्नतम डाकू के वोट से वह २ के मुकाबले १ से जीत जायेगा। यह समझना जरूरी है कि तीसरा इस प्रस्ताव से सहमत होगा क्योंकि वह अगर नही होता तो पहला मारा जायेगा और फिर दो डाकुओं में उसे कुछ भी नही मिलेगा। तर्क की दृष्टि से यह तीसरे डाकू के लिये सर्वश्रेष्ठ सौदा है। यदि इसी तरह चार डाकुओं के बारे में सोचें तो श्रेष्ठतम से निम्नतम क्रमशः ९९, ०, १, ० मोहरों का बँटवारा सर्वोत्तम होगा और पाँच डाकुओं के लिये ९८, ०, १, ०, १ का बँटवारा। हम खेल को अगणित डाकुओं तक बढ़ा सकते है, हालाँकि २०० के बाद - सिवाय कुछ विशेष संख्याओं के - कुछ डाकू तो मरेंगें ही कैसा भी प्रस्ताव रखा जाये।
चूँकि यह सर्वश्रेष्ठ हल है इस समस्या का, हम यह आशा कर सकते हैं कि वे डाकू ऐसा ही करेंगे। लेकिन वास्तविक जिंदगी में ऐसा हुआ तो क्या अनुमान है आपका? सहज ही हम जानते हैं ऐसा नही होगा। तीन डाकुओं के खेल में तीसरा वाला एक मोहर के प्रस्ताव को कभी पारित नही करेगा क्योंकि उसके अनुसार एक मोहर और शून्य मोहर में ज्यादा अंतर नही और ऐसे प्रस्ताव को रखने वाले को मार कर बदला लेना ज्यादा उचित होगा। और ज्येष्ठ डाकू अगर मनोविज्ञान को जरा भी समझता होगा तो एक से ज्यादा ही प्रस्तावित करेगा निम्नतम डाकू का वोट लेने के लिये। मामला कितने पर निपटता है यह तो दोनो पर निर्भर करता है, पर परेशानी हमारे सामने यह है कि जब तर्कसंगत हल से हट कर करने पर तीसरे डाकू को ज्यादा लाभ होता है तो फिर पहले वाला हल तर्कसंगत कैसे हुआ? तर्क-अतर्क की परिभाषा क्या विज्ञान और दर्शनशास्त्र के विकास द्वारा सीमित है या फिर कुछ ऐसा है जिसका हम अनुमान भी नही लगा पा रहें है?
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